नई वैज्ञानिक रिसर्च में सामने आया है कि दुनिया भर में धान (Rice) की खेती अब ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत बनती जा रही है। इस स्टडी के अनुसार धान के खेतों से मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी खतरनाक गैसें निकल रही हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
चावल दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थों में से एक है और भारत, चीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में करोड़ों लोगों का मुख्य भोजन है। लेकिन जिस फसल पर वैश्विक आबादी का बड़ा हिस्सा निर्भर है, वही अब पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के दशक की तुलना में धान के खेतों से निकलने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। 2010 के दशक में धान की खेती से हर साल करीब 1.1 अरब टन CO₂ के बराबर गैसें उत्सर्जित हुईं। यह मात्रा करोड़ों वाहनों के सालाना प्रदूषण के बराबर मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि क्षेत्र में पशुपालन के बाद धान की खेती अब दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषण स्रोत बन चुकी है। यह स्थिति आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की समस्या को और गंभीर बना सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार धान की खेती में पानी भरे खेतों (paddy fields) में लंबे समय तक जलभराव रहने से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया सक्रिय होकर जैविक पदार्थों को तोड़ते हैं, जिससे मीथेन गैस उत्पन्न होती है। मीथेन को एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस माना जाता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक तेजी से धरती को गर्म करती है।
स्टडी में यह भी सुझाव दिया गया है कि अगर पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव किया जाए और क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि तकनीकों को अपनाया जाए, तो इन उत्सर्जनों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते टिकाऊ खेती के तरीकों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
यह रिपोर्ट एक बार फिर इस बात पर जोर देती है कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी नई तकनीकों को अपनाना अब जरूरी हो गया है।

