कानपुर कलेक्ट्रेट में बड़ा एक्शन: टाइपिंग टेस्ट में फेल होने पर तीन जूनियर क्लर्क बने चपरासी
उत्तर प्रदेश के कानपुर कलेक्ट्रेट से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। यहां तीन जूनियर लिपिकों को टाइपिंग परीक्षा में लगातार दो बार असफल होने के बाद पदावनत कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी चपरासी बना दिया गया है। यह सख्त कार्रवाई जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह के निर्देश पर की गई है।
जानकारी के अनुसार, प्रेमनाथ यादव, अमित कुमार यादव और नेहा श्रीवास्तव को मृतक आश्रित कोटे के तहत जूनियर लिपिक के पद पर नियुक्त किया गया था। सरकारी नियमों के मुताबिक, इस पद पर नियुक्ति के बाद एक वर्ष के भीतर टाइपिंग परीक्षा पास करना अनिवार्य होता है। इसके लिए न्यूनतम मानक एक मिनट में 25 शब्द टाइप करना तय किया गया है।
तीनों कर्मचारी इस बुनियादी योग्यता को पूरा करने में असफल रहे। वर्ष 2024 में आयोजित पहली टाइपिंग परीक्षा में ये पास नहीं हो सके, जिसके बाद नियमों के तहत उनकी वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी गई। प्रशासन ने उन्हें सुधार का अवसर देते हुए 2025 में दूसरी बार परीक्षा में बैठने का मौका दिया, लेकिन इस बार भी वे निर्धारित गति हासिल नहीं कर पाए।
लगातार दो बार असफल रहने के बाद जिलाधिकारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए तीनों को पदावनत करने का फैसला लिया। आदेश के अनुसार, प्रेमनाथ यादव, जो डीएम कैंप कार्यालय में तैनात थे, और अमित कुमार यादव व नेहा श्रीवास्तव, जो कलेक्ट्रेट में कार्यरत थे, अब चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्य करेंगे।
इस फैसले को प्रशासनिक अनुशासन और कार्यकुशलता बनाए रखने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि लिपिकीय कार्यों में टाइपिंग एक बुनियादी आवश्यकता है। यदि कर्मचारी इस न्यूनतम योग्यता को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो इससे सरकारी कामकाज प्रभावित होता है।
यह मामला अब शहर में चर्चा का विषय बन गया है। जहां कुछ लोग इसे प्रशासन की सख्ती और पारदर्शिता का उदाहरण बता रहे हैं, वहीं कुछ लोग मृतक आश्रित कोटे से होने वाली नियुक्तियों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि भर्ती के समय ही बुनियादी कौशल की जांच होनी चाहिए, ताकि बाद में इस तरह की स्थिति न बने।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, सेवा नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि टाइपिंग परीक्षा में पहली असफलता पर वेतन वृद्धि रोकी जाती है और दूसरी बार असफल होने पर पदावनति या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसी प्रावधान के तहत यह कदम उठाया गया है।
इस कार्रवाई का असर अन्य कर्मचारियों पर भी देखने को मिल रहा है। कलेक्ट्रेट में कार्यरत कई कर्मचारी अब अपनी टाइपिंग और अन्य तकनीकी कौशल को सुधारने में जुट गए हैं, ताकि भविष्य में उन्हें ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
कुल मिलाकर, कानपुर कलेक्ट्रेट का यह मामला सरकारी व्यवस्था में योग्यता और जवाबदेही के महत्व को उजागर करता है। यह संदेश साफ है कि सरकारी नौकरी में बने रहने के लिए केवल नियुक्ति ही नहीं, बल्कि आवश्यक कौशल और दक्षता भी उतनी ही जरूरी है।

