28 May 2026, Thu

हैदराबाद के पर्वतारोही का एवरेस्ट पर निधन, परिवार ने शव वहीं छोड़ने का किया फैसला; जानिए क्यों

हैदराबाद: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने का सपना पूरा करने वाले हैदराबाद के 53 वर्षीय टेक प्रोफेशनल और पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी की दुखद मृत्यु के बाद उनके परिवार ने एक भावुक और कठिन फैसला लिया है। परिवार ने तय किया है कि अरुण का पार्थिव शरीर एवरेस्ट पर ही रहने दिया जाएगा। यह निर्णय न केवल परिस्थितियों की मजबूरी को दर्शाता है, बल्कि अरुण के पहाड़ों के प्रति गहरे प्रेम और सम्मान को भी प्रतिबिंबित करता है।

अरुण कुमार तिवारी ने पिछले सप्ताह सफलतापूर्वक माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया था। यह उपलब्धि किसी भी पर्वतारोही के लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना मानी जाती है। हालांकि, शिखर से लौटते समय हिलैरी स्टेप के पास, जो एवरेस्ट की चोटी से लगभग 60 मीटर नीचे स्थित है, उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। इस खबर ने पर्वतारोहण समुदाय और उनके परिजनों को गहरे सदमे में डाल दिया।

मृत्यु के बाद सबसे बड़ा सवाल उनके पार्थिव शरीर को नीचे लाने का था। लेकिन विशेषज्ञों और पर्वतारोहण एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से से शव को नीचे लाना बेहद कठिन, जोखिमभरा और महंगा कार्य है। पर्वतारोहण अभियान संचालित करने वाली एजेंसी ‘पायनियर एडवेंचर’ ने पहले इस अभियान पर करीब 1.1 करोड़ रुपये का खर्च बताया था। बाद में इसे घटाकर लगभग 90 लाख रुपये आंका गया, जो एवरेस्ट पर चढ़ाई के औसत खर्च से भी दोगुना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, 8,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई वाले क्षेत्र को “डेथ जोन” कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम होता है और तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है। ऐसी परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करना अत्यंत खतरनाक होता है। शव को निकालने के लिए 8 से 10 अनुभवी शेरपाओं की टीम की जरूरत पड़ती है, जिन्हें कई दिनों तक उसी ऊंचाई पर रहकर काम करना पड़ता है।

शव अक्सर बर्फ में पूरी तरह जम जाता है, जिसे बाहर निकालने के लिए विशेष उपकरणों और भारी मेहनत की आवश्यकता होती है। इसके बाद शव को रस्सियों से बांधकर खतरनाक और हिमस्खलन-प्रभावित रास्तों से नीचे लाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में बचाव दल के सदस्यों की जान भी जोखिम में पड़ सकती है।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अरुण तिवारी के परिवार ने उनका पार्थिव शरीर एवरेस्ट पर ही छोड़ने का फैसला किया है। परिवार का कहना है कि अरुण को पहाड़ों से बेहद लगाव था और वह हमेशा प्रकृति के करीब रहना पसंद करते थे। ऐसे में एवरेस्ट की गोद में उनका अंतिम विश्राम उनके व्यक्तित्व और जुनून के अनुरूप है।

पर्वतारोहण की दुनिया में यह कोई असामान्य घटना नहीं है। एवरेस्ट पर कई ऐसे पर्वतारोहियों के शव आज भी मौजूद हैं, जिन्हें नीचे लाना संभव नहीं हो पाया। अरुण तिवारी की कहानी साहस, जुनून और समर्पण की मिसाल है, जिसने अपने सपने को पूरा करने के लिए जीवन की अंतिम सीमा तक संघर्ष किया। उनकी उपलब्धि और पर्वतों के प्रति उनका प्रेम हमेशा याद रखा जाएगा।

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