8 Jul 2026, Wed

‘सच्चाई दबाने की कोशिश’, दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ पर रोक से भड़का सिख समुदाय, DSGMC ने उठाया कदम

 

पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ की राजनीतिक ड्रामा फिल्म ‘सतलुज’ रिलीज के बाद से ही विवादों में घिर गई है। फिल्म को हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज किया गया था, लेकिन रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। फिल्म के अचानक हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया और सिख समुदाय में नाराजगी देखने को मिल रही है। अब इस पूरे मामले पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

कमेटी ने फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की निंदा करते हुए इसे मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कहानी को दबाने की कोशिश बताया है। कमेटी का कहना है कि यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास के एक दर्दनाक और महत्वपूर्ण अध्याय को सामने लाने का प्रयास है। ऐसे में फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने से रोकना गलत है।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जसवंत सिंह खालरा ने सच्चाई को दुनिया के सामने लाने का साहस दिखाया था। उन्होंने पंजाब में 1980 और 1990 के दशक के दौरान हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अज्ञात शवों के अवैध अंतिम संस्कार के मामलों को उजागर किया था। कमेटी के अनुसार, खालरा ने करीब 25 हजार अज्ञात शवों के अवैध दाह संस्कार से जुड़े सबूत जुटाए थे और इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया था।

सिख समुदाय में बढ़ती नाराजगी को देखते हुए अब दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी ने फिल्म को खुद लोगों तक पहुंचाने का फैसला किया है। कमेटी ने घोषणा की है कि देशभर में इस फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग कराई जाएगी। इसके अलावा कमेटी के अधीन आने वाले स्कूलों और कॉलेजों में जसवंत सिंह खालरा के जीवन, संघर्ष और योगदान पर विशेष सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे, ताकि युवा पीढ़ी उनके काम और इतिहास के इस अध्याय को समझ सके।

फिल्म ‘सतलुज’ का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है। इसमें दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा की मुख्य भूमिका निभाई है। कहानी एक साधारण बैंक क्लर्क से मानवाधिकार कार्यकर्ता बने खालरा के जीवन पर आधारित है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे उन्होंने पंजाब के अशांत दौर में कथित फर्जी एनकाउंटर और गुप्त रूप से शवों को ठिकाने लगाने जैसे गंभीर मामलों को उजागर किया।

जसवंत सिंह खालरा साल 1995 में रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गए थे। बाद में अदालत ने पंजाब पुलिस के कुछ कर्मियों को उनके अपहरण, उत्पीड़न और हत्या के मामले में दोषी पाया था। हालांकि, उनका शव कभी बरामद नहीं हो सका।

फिल्म का सफर शुरुआत से ही विवादों से भरा रहा है। अब ओटीटी से हटाए जाने के बाद यह मामला और गरमा गया है। ऐसे में देखना होगा कि कमेटी की सार्वजनिक स्क्रीनिंग पहल के बाद फिल्म को लेकर चल रही बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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