वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर अब भारत की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों पर भारी पड़ता दिख रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन इसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें पिछले दो वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई हैं। इसका सीधा असर सरकारी तेल कंपनियों के मुनाफे पर पड़ रहा है और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर भारी अंडर-रिकवरी का सामना कर रही हैं। बताया जा रहा है कि इन कंपनियों को संयुक्त रूप से प्रतिदिन करीब 1200 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा है।
पिछले 10 हफ्तों से पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। हालांकि, भारत में उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। इसके चलते तेल कंपनियों को लागत से कम कीमत पर ईंधन बेचने की मजबूरी है।
जानकारी के अनुसार, पेट्रोल पर कंपनियों को लगभग 14 रुपये प्रति लीटर, डीजल पर 42 रुपये प्रति लीटर और घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर करीब 674 रुपये प्रति सिलेंडर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। मार्च महीने में एलपीजी की कीमतों में 60 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी जरूर की गई थी, लेकिन इसके बावजूद इसकी खुदरा कीमतें वास्तविक लागत से काफी कम बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति लंबे समय तक जारी रहती है, तो तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। एक सूत्र के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में होने वाला नुकसान कंपनियों के पूरे साल के अनुमानित मुनाफे को खत्म कर सकता है। अनुमान है कि इस तिमाही में होने वाला नुकसान करीब 76,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। वहीं, अगर मार्च महीने के घाटे को भी इसमें जोड़ दिया जाए, तो कुल नुकसान लगभग 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट Prashant Vashisht ने कहा कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची कीमतों के कारण भारतीय पेट्रोलियम कंपनियां भारी दबाव में हैं। उनका कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो कंपनियों को रोजाना करीब 1000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इतनी बड़ी वित्तीय मार लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। यदि सरकार जल्द कोई राहत पैकेज, सब्सिडी या कीमतों में संशोधन नहीं करती, तो कंपनियों की बैलेंस शीट पर गंभीर असर पड़ सकता है। इससे भविष्य में निवेश और आपूर्ति व्यवस्था भी प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।
फिलहाल सरकार उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ कम रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन दूसरी ओर तेल कंपनियों का बढ़ता घाटा चिंता का विषय बनता जा रहा है। आने वाले महीनों में कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें और सरकार की नीतियां तय करेंगी कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव होगा या कंपनियों को इसी तरह नुकसान उठाना पड़ेगा।

