1 Jul 2026, Wed

जिस तकिए पर रोज चैन की नींद सोते हैं, वही बन सकता है कमजोर इम्यून की वजह, डॉक्टर ने दी चेतावनी

आरामदायक नींद के लिए अधिकतर लोग सिर के नीचे तकिया रखकर सोना पसंद करते हैं। लेकिन जिस तकिए का इस्तेमाल हर रात छह से आठ घंटे किया जाता है, उसकी साफ-सफाई पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। समय के साथ तकिए और उसके कवर पर पसीना, त्वचा का तेल, मृत कोशिकाएं, धूल, बाल और दूसरे एलर्जन जमा हो सकते हैं। इससे खासकर एलर्जी, अस्थमा या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों की परेशानी बढ़ सकती है।

हालांकि, केवल गंदे तकिए के कारण शरीर का पूरा इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाने का दावा वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार असली चिंता तकिए और बिस्तर में जमा डस्ट माइट एलर्जन, धूल और गंदगी की होती है, जिनके संपर्क में आने से कुछ लोगों को छींक, नाक बंद होना, खांसी, आंखों में खुजली और सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

तकिए में जमा हो सकते हैं एलर्जन

डस्ट माइट बेहद छोटे जीव होते हैं, जो गर्म और नमी वाले वातावरण में पनपते हैं। ये अक्सर गद्दे, तकिए, चादर, कंबल और दूसरी मुलायम चीजों में पाए जाते हैं। डस्ट माइट स्वयं काटते नहीं हैं, लेकिन उनके शरीर और अपशिष्ट में मौजूद प्रोटीन संवेदनशील लोगों में एलर्जी पैदा कर सकते हैं।

रातभर तकिए के बेहद करीब रहने के कारण व्यक्ति इन एलर्जन के संपर्क में आता रहता है। धूल से एलर्जी या अस्थमा वाले लोगों में इसके कारण सुबह उठने पर छींक, नाक बहना, गले में जलन, खांसी या घरघराहट जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं।

त्वचा पर भी पड़ सकता है असर

गंदे और लंबे समय से बिना धोए इस्तेमाल किए जा रहे पिलो कवर पर तेल, पसीना, कॉस्मेटिक उत्पाद और बैक्टीरिया जमा हो सकते हैं। संवेदनशील या मुंहासों वाली त्वचा में यह गंदगी परेशानी बढ़ा सकती है। हालांकि, मुंहासों के पीछे हार्मोन, त्वचा में बनने वाला अतिरिक्त तेल, बंद रोमछिद्र और आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण होते हैं। केवल तकिए को मुंहासों का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। साफ चादर और पिलो कवर का इस्तेमाल बैक्टीरिया के जमाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

कितनी बार बदलें पिलो कवर?

पिलो कवर और चादर को सप्ताह में कम से कम एक बार धोना बेहतर माना जाता है। जिन्हें ज्यादा पसीना आता है, त्वचा तैलीय रहती है या मुंहासों की समस्या है, वे पिलो कवर को इससे अधिक बार बदल सकते हैं। धूल से एलर्जी वाले लोगों को बिस्तर की चीजें गर्म पानी में धोने और एलर्जन-रोधी पिलो कवर इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। मेयो क्लिनिक के अनुसार करीब 54 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान वाले पानी में साप्ताहिक धुलाई डस्ट माइट और उनके एलर्जन को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।

तकिया कब बदलना चाहिए?

हर तकिए को अनिवार्य रूप से छह महीने में बदलना जरूरी नहीं है। तकिया बदलने का समय उसकी सामग्री, गुणवत्ता, इस्तेमाल और निर्माता के निर्देशों पर निर्भर करता है। यदि तकिया दबकर सपाट हो गया हो, उसमें गांठें बन गई हों, दुर्गंध आने लगी हो या उससे गर्दन को सही सहारा न मिल रहा हो, तो उसे बदल देना चाहिए। एलर्जी से जुड़ी संस्था AAFA तकियों को लगभग दो वर्ष में बदलने की सलाह देती है।

तकिए को साफ और पूरी तरह सूखा रखना, देखभाल संबंधी लेबल के अनुसार धोना और नियमित रूप से पिलो कवर बदलना बेहतर नींद तथा स्वच्छता के लिए जरूरी है। लगातार खांसी, एलर्जी, सांस की परेशानी या त्वचा पर गंभीर समस्या होने पर डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।

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