मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता का दावा करने वाले पाकिस्तान पर अब दोहरा खेल खेलने के आरोप लग रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिकी हमलों से बचाने के लिए ईरान के विमानों को अपने एयरफील्ड्स पर शरण दी थी। इस खबर के सामने आने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने ईरानी विमानों को अपने एयरबेस पर पार्क करने की अनुमति दी थी ताकि वे संभावित अमेरिकी हवाई हमलों से सुरक्षित रह सकें। बताया जा रहा है कि यह कदम उस समय उठाया गया जब अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष चरम पर था और दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा था।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने कुछ सैन्य और खुफिया विमानों को पाकिस्तान के एयरफील्ड्स पर भेजा था। इनमें एक टोही और इंटेलिजेंस विमान भी शामिल बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा संघर्षविराम को लेकर बयान दिए जाने के तुरंत बाद ईरान ने अपने विमानों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना शुरू किया था। इसी दौरान कुछ विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर उतारे गए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान ने अपने कुछ नागरिक विमानों को अफगानिस्तान में भी अस्थायी तौर पर खड़ा किया था ताकि वे किसी संभावित हमले की जद में न आएं। हालांकि पाकिस्तान की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि नूर खान एयरबेस राजधानी के बेहद व्यस्त इलाके में स्थित है और वहां इतने बड़े स्तर पर विमानों की मौजूदगी को छिपाना संभव नहीं है।
पाकिस्तान की इस कथित भूमिका ने अमेरिका में भी नाराजगी पैदा कर दी है। अमेरिकी सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े कई विशेषज्ञों ने इस खबर पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि पाकिस्तान ने वास्तव में ईरान की मदद की है, तो यह अमेरिका के भरोसे के खिलाफ माना जाएगा। खासतौर पर तब, जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच शांति स्थापित कराने वाला देश बताता रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए संघर्षविराम प्रस्ताव को “बेवकूफी भरा” बताते हुए खारिज कर दिया है। ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका किसी दबाव में नहीं आएगा और ईरान के खिलाफ सख्त रुख जारी रहेगा। उन्होंने यहां तक दावा किया कि अमेरिका इस संघर्ष में “पूर्ण विजय” हासिल करेगा।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर वैश्विक राजनीति और तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
फिलहाल पाकिस्तान पर लगे इन आरोपों ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को मुश्किल में डाल दिया है। एक तरफ वह खुद को शांति का समर्थक बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान को कथित मदद देने की खबरों ने उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिका इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है।

