हिजबुल्लाह ने इजरायल के खिलाफ इस्तेमाल किया नया खतरनाक हथियार, फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन से बढ़ी चिंता
तेल अवीव: इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच जारी तनाव के बीच एक नया मोड़ सामने आया है। लेबनान स्थित आतंकी संगठन हिजबुल्लाह ने इजरायली सेना के खिलाफ एक बेहद आधुनिक और खतरनाक हथियार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। यह हथियार छोटे आकार के फाइबर-ऑप्टिक नियंत्रित ड्रोन हैं, जिन्हें युद्ध के मैदान में एक नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इन ड्रोनों की खासियत यह है कि इन्हें रेडियो सिग्नल की जगह बेहद पतली फाइबर-ऑप्टिक केबल के जरिए नियंत्रित किया जाता है। यही वजह है कि ये ड्रोन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक जामिंग सिस्टम और निगरानी तकनीकों को आसानी से चकमा देने में सक्षम हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक युद्ध की दिशा बदल सकती है।
आम ड्रोनों से कितना अलग है यह हथियार?
आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन रेडियो फ्रीक्वेंसी या वायरलेस सिग्नल पर निर्भर होते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के जरिए निष्क्रिय किया जा सकता है। लेकिन फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन पूरी तरह अलग तकनीक पर काम करते हैं। इनमें किसी भी प्रकार का वायरलेस सिग्नल नहीं होता, बल्कि ऑपरेटर और ड्रोन के बीच एक पतली फाइबर केबल जुड़ी होती है, जिससे सीधा और स्थिर नियंत्रण संभव होता है।
इसी कारण इन्हें ट्रैक करना और रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। इनका छोटा आकार और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता इन्हें और भी घातक बनाती है।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
लंदन स्थित थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) के ड्रोन विशेषज्ञ रॉबर्ट टोलस्ट के अनुसार, “यदि ऑपरेटर प्रशिक्षित हो तो ये ड्रोन बेहद घातक साबित हो सकते हैं। ये कम ऊंचाई पर उड़कर सीधे लक्ष्य के बेहद करीब पहुंचकर अचानक हमला कर सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें रोकना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। क्योंकि या तो इन्हें हवा में ही नष्ट करना होगा या फिर उनकी फाइबर-केबल को काटना होगा, जो लगभग असंभव जैसा है।
इजरायल के लिए बढ़ी नई चुनौती
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान समर्थित हिजबुल्लाह इन ड्रोनों का इस्तेमाल इजरायली सैनिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए कर रहा है। इनकी पहचान मुश्किल होने के कारण सुरक्षा बलों के लिए खतरा और बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस नई तकनीक के आने से भविष्य के युद्ध और अधिक जटिल और तकनीक-आधारित हो जाएंगे। ऐसे में दुनिया भर की सेनाओं को अपनी रक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है।

