अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। खबरों के मुताबिक ईरान और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। इस प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनाव कम करना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ाना बताया जा रहा है।
हालांकि इस संभावित डील को लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कड़ी नाराजगी जताई है।
क्या है प्रस्तावित समझौता?
रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच एक शुरुआती समझौते पर सहमति बनी है, जिसमें संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने और महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से सुरक्षित रूप से खोलने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
इस समझौते पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेरी गालीबाफ़ के शामिल होने की चर्चा है। हालांकि अभी आधिकारिक पुष्टि पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और कई बिंदुओं पर बातचीत जारी है।
नेतन्याहू ने जताई कड़ी आपत्ति
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संभावित समझौते पर असहमति जताते हुए कहा कि इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल हर मुद्दे पर एक राय नहीं रखते, लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री के रूप में उनका मुख्य दायित्व अपने देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। नेतन्याहू के अनुसार ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
देश के नाम नेतन्याहू का संदेश
नेतन्याहू ने इजरायली नागरिकों को संबोधित करते हुए एक संदेश जारी किया। इसमें उन्होंने कहा कि वह दशकों से ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के खिलाफ काम कर रहे हैं और यह उनके जीवन का मिशन रहा है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि चाहे समझौता हो या न हो, इजरायल यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों—न आज, न कल और न ही भविष्य में।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार के प्रयासों से देश ने एक बड़े खतरे को टाल दिया है, जो पहले बहुत गंभीर माना जा रहा था।
क्षेत्रीय तनाव और बढ़ी चिंता
इस संभावित अमेरिका-ईरान समझौते ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। जहां एक तरफ इसे शांति की दिशा में कदम माना जा रहा है, वहीं इजरायल इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मान रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता आगे बढ़ता है तो पश्चिम एशिया की रणनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

