“इंडिया गठबंधन में दरार या रणनीतिक मतभेद? विपक्षी एकता की तस्वीर उस वक्त धुंधली पड़ती नजर आई, जब इंडिया ब्लॉक की अहम बैठक से पहले दो बड़े सहयोगी दल—डीएमके और आम आदमी पार्टी—ने दूरी बना ली। दोनों दलों ने कांग्रेस पर भरोसा तोड़ने और राजनीतिक धोखा देने के आरोप लगाए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या 2029 की सियासी लड़ाई से पहले विपक्षी महागठबंधन की नींव कमजोर पड़ रही है?
दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित इंडिया ब्लॉक की बैठक में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना (उद्धव गुट), झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत 22 दलों के शीर्ष नेता शामिल हो रहे हैं। बैठक का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना और विपक्षी एकता का संदेश देना है। लेकिन बैठक शुरू होने से पहले ही डीएमके और आम आदमी पार्टी की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके ने कांग्रेस पर राजनीतिक विश्वासघात का आरोप लगाते हुए बैठक का बहिष्कार किया है। वहीं आम आदमी पार्टी पहले ही सार्वजनिक रूप से इंडिया गठबंधन से दूरी बनाने का संकेत दे चुकी है। ऐसे में विपक्षी खेमे के भीतर बढ़ती असहमति अब खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है।
बैठक में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी विपक्षी एकता को मजबूत दिखाने की कोशिश जरूर है, लेकिन सहयोगी दलों की नाराजगी कई सवाल भी खड़े कर रही है। क्या विपक्ष अपने अंदरूनी मतभेदों को भुलाकर एकजुट रह पाएगा? क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों का भरोसा फिर से जीत पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इंडिया ब्लॉक भाजपा के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश करने की स्थिति में है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की ताकत केवल नेताओं की मौजूदगी से नहीं, बल्कि सहयोगी दलों के बीच आपसी विश्वास से तय होती है। ऐसे में डीएमके और आप की दूरी विपक्षी राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत मानी जा रही है।
फिलहाल, दिल्ली में हो रही यह बैठक विपक्ष की आगामी रणनीति तय करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन इस बैठक से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश क्या होगा—विपक्ष की एकजुटता या गठबंधन के भीतर बढ़ती दरार? देश की राजनीति की नजरें अब इसी पर टिकी हैं।”**

