सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने भारतीय कॉर्पोरेट संस्कृति और कार्यस्थलों के माहौल को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वीडियो में एक करियर कोच ने भारतीय वर्कप्लेस में लंबे समय से सामान्य मानी जाने वाली कुछ ऐसी आदतों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें उन्होंने “टॉक्सिक वर्क कल्चर” का हिस्सा बताया है।
इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर @thinksage.in नामक अकाउंट से साझा किया गया है। वीडियो में आईआईएम से पढ़ाई कर चुके करियर कोच विजय चंदोला ने कार्यस्थलों पर होने वाले तीन ऐसे व्यवहारों की आलोचना की है, जो उनके अनुसार कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्य संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
बर्नआउट को उपलब्धि मानने की संस्कृति
विजय चंदोला के अनुसार, भारतीय वर्कप्लेस की सबसे बड़ी समस्या अत्यधिक काम और थकावट को गौरव की तरह पेश करना है। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी और मैनेजर देर रात या सुबह तक काम करने को एक उपलब्धि की तरह दिखाते हैं।
वीडियो में उन्होंने कहा कि कई लोग सुबह चार या पांच बजे तक जागकर काम करने को अपनी मेहनत का प्रतीक मानते हैं और इसे गर्व के साथ साझा करते हैं। उनके मुताबिक, लगातार तनाव और थकान को सफलता का पैमाना मानना कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
सार्वजनिक रूप से आलोचना को बताया गलत
वीडियो में दूसरा मुद्दा कर्मचारियों के साथ सार्वजनिक रूप से किए जाने वाले व्यवहार को लेकर उठाया गया। विजय चंदोला ने कहा कि कई कार्यस्थलों पर कर्मचारियों को सबके सामने डांटना, उन पर चिल्लाना या लगातार दूसरों से तुलना करना सामान्य माना जाता है।
उन्होंने कहा कि कुछ प्रबंधक यह मानते हैं कि सार्वजनिक आलोचना से कर्मचारियों का प्रदर्शन बेहतर होगा, जबकि वास्तव में यह कर्मचारियों के आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।
उनका मानना है कि कार्यस्थल पर सम्मानजनक संवाद और सकारात्मक प्रतिक्रिया की संस्कृति विकसित करना अधिक जरूरी है।
व्यक्तिगत सीमाओं की अनदेखी भी बड़ी समस्या
वीडियो में तीसरे मुद्दे के रूप में व्यक्तिगत सीमाओं की अनदेखी को उठाया गया। विजय चंदोला ने कहा कि कई कंपनियां और प्रबंधक कर्मचारियों के निजी समय का सम्मान नहीं करते।
उन्होंने बताया कि छुट्टी, बीमारी, अस्पताल में भर्ती होने, पारिवारिक शोक या किसी व्यक्तिगत आपात स्थिति के दौरान भी कर्मचारियों को लगातार कॉल और संदेश किए जाते हैं। उनके अनुसार, यह व्यवहार दर्शाता है कि कुछ संस्थानों में कर्मचारियों के निजी जीवन और कार्य के बीच संतुलन का सम्मान नहीं किया जाता।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इनमें से कोई भी व्यवहार सामान्य नहीं माना जाना चाहिए और कर्मचारियों को ऐसे माहौल को चुनौती देने का अधिकार है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने साझा किए अपने अनुभव
वीडियो वायरल होने के बाद बड़ी संख्या में सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया दी और अपने अनुभव साझा किए।
कई लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने करियर में ऐसे टॉक्सिक वर्क कल्चर का सामना किया है। एक यूजर ने लिखा कि वह नियमित रूप से देर रात और सप्ताहांत में भी काम करता था, लेकिन इसके बावजूद उसे अपेक्षित प्रमोशन नहीं मिला।
एक अन्य यूजर ने दावा किया कि उसकी पिछली कंपनी में मैनेजर ने उसे ऑफिस के दरवाजे पर खड़ा रहने के लिए कहा था, ताकि लक्ष्य पूरा किए बिना कोई कर्मचारी बाहर न जा सके।
कार्यस्थल संस्कृति पर फिर शुरू हुई चर्चा
इस वीडियो ने एक बार फिर भारतीय कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य, कार्य-जीवन संतुलन और सम्मानजनक व्यवहार को लेकर चर्चा तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर उत्पादकता के लिए केवल काम के घंटे बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्मचारियों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
सोशल मीडिया पर जारी बहस यह संकेत देती है कि अब कर्मचारी कार्यस्थलों पर स्वस्थ और सम्मानजनक माहौल की अपेक्षा पहले से कहीं अधिक करने लगे हैं।

