पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी सियासी घमासान के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर असली तृणमूल कांग्रेस किसकी है? इस मुद्दे पर अंतिम फैसला अब भारत निर्वाचन आयोग को करना है। पार्टी के भीतर बढ़ती अंदरूनी कलह और बगावत के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने राष्ट्रीय कार्यसमिति का पुनर्गठन करते हुए इसकी जानकारी चुनाव आयोग को सौंप दी है।
सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग को भेजी गई सूची में ममता बनर्जी को ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) का राष्ट्रीय अध्यक्ष नामित किया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने हाल ही में एक विशेष बैठक आयोजित कर ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का दावा किया था।
पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई तेज
तृणमूल कांग्रेस में जारी राजनीतिक संकट अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पार्टी के भीतर दो अलग-अलग गुट अपने-अपने दावों के साथ सामने आए हैं। एक ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला मूल गुट है, जबकि दूसरी ओर रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी नेता पार्टी पर अपना दावा ठोक रहे हैं।
ममता गुट का कहना है कि कुछ नेता पार्टी के नाम और संगठन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसी को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने सीधे चुनाव आयोग का रुख किया है।
अभिषेक बनर्जी को सौंपी गई अहम जिम्मेदारी
पार्टी की ओर से चुनाव आयोग को भेजी गई संशोधित राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची में कई प्रमुख नेताओं को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
इस सूची के अनुसार, ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि उनके भतीजे और वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी को ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी की जिम्मेदारी दी गई है।
इसके अलावा, चंद्रिमा भट्टाचार्य को राज्य अध्यक्ष, डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त महासचिव तथा सुभाषिश चक्रवर्ती को पार्टी का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
पार्टी नेताओं का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया संगठनात्मक नियमों और पार्टी संविधान के तहत की गई है।
चुनाव आयोग के सामने चुनौती
अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका भारत निर्वाचन आयोग की होगी। आयोग को यह तय करना होगा कि पार्टी का आधिकारिक और वैध नेतृत्व किसके पास है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों गुट अपने-अपने दावों पर अड़े रहते हैं, तो चुनाव आयोग को संगठनात्मक समर्थन, विधायकों और सांसदों की संख्या, पार्टी संविधान तथा अन्य दस्तावेजों के आधार पर फैसला लेना पड़ सकता है।
इससे पहले देश की कई राजनीतिक पार्टियों में विभाजन के दौरान भी चुनाव आयोग को इसी तरह के विवादों का समाधान करना पड़ा है।
बागी गुट ने भी ठोका है दावा
गौरतलब है कि हाल ही में रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने एक विशेष सत्र आयोजित कर विधायक अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष घोषित किया था। बागी गुट का दावा है कि पार्टी के बड़ी संख्या में विधायक और नेता उनके साथ हैं।
इसके साथ ही बागी नेताओं ने भी चुनाव आयोग को अपनी कार्यवाही और दस्तावेज सौंपने की बात कही है।
बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल
तृणमूल कांग्रेस में जारी इस सियासी संघर्ष ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है।
फिलहाल, सभी की निगाहें चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हुई हैं, क्योंकि आयोग का निर्णय ही तय करेगा कि पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस का असली नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।

