नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर पैदा हुई खींचतान अब राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गई है। पार्टी के बागी सांसदों द्वारा अलग राजनीतिक पहचान की मांग किए जाने के बाद मामला लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पास पहुंच गया है। सूत्रों के अनुसार, स्पीकर दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेंगे।
जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के बागी गुट के करीब 20 सांसदों ने हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा था। इन सांसदों ने कथित तौर पर खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने और अपने गुट का नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय करने का अनुरोध किया है। इस कदम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ संसद के अंदर भी हलचल बढ़ा दी है।
सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट से भी इस मामले में उनका पक्ष मांगा है। इसके लिए संबंधित सांसदों को ई-मेल भेजकर बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है। स्पीकर दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय करेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कानूनी पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है। संसदीय सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में केंद्रीय विधि मंत्रालय से कानूनी राय मांग सकते हैं। मंत्रालय किसी वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ या संवैधानिक अधिकारी से परामर्श लेने के बाद अपनी राय देगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरा उतर सके और भविष्य में किसी कानूनी चुनौती का सामना न करना पड़े।
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि मामला इतना सरल नहीं है। लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचारी ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा है कि किसी राजनीतिक दल का विलय दूसरे दल में हो सकता है, लेकिन केवल सांसदों या विधायकों का समूह अपने स्तर पर किसी अन्य पार्टी में विलय का दावा नहीं कर सकता। ऐसे में बागी सांसदों की मांग पर फैसला लेते समय संवैधानिक प्रावधानों का विशेष ध्यान रखना होगा।
सूत्रों के मुताबिक, इस मामले पर अंतिम निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है। मानसून सत्र आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा अध्यक्ष बागी सांसदों की मांग को स्वीकार करते हैं या फिर संवैधानिक और कानूनी आधार पर कोई अलग फैसला सुनाते हैं।
टीएमसी में उभरा यह संकट न केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए चुनौती माना जा रहा है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और उसके दूरगामी प्रभावों पर टिकी हुई है।

