इजरायल-अमेरिका-ईरान तनाव गहराया, होर्मुज जलडमरूमध्य बना वैश्विक चिंता का केंद्र
मध्य पूर्व में जारी तनाव ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। United States द्वारा Iran के बंदरगाहों पर की गई नौसैनिक नाकेबंदी के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं। इस कदम का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है, खासकर China जैसे बड़े आयातक देशों पर।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ कहा है कि ईरान अब चीन को तेल और गैस की सप्लाई नहीं कर पाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया की नजरें Strait of Hormuz पर टिकी हैं, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान से आने-जाने वाले समुद्री व्यापार को 36 घंटे के भीतर लगभग पूरी तरह रोक दिया है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स इस दावे पर सवाल उठा रही हैं। खबरों के मुताबिक, अमेरिकी नाकेबंदी के बावजूद ईरान के कम से कम तीन जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य पार करने में सफल रहे हैं। इससे साफ है कि क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में नहीं है और तनाव लगातार बना हुआ है।
इस बीच, Russia ने चीन को ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने का भरोसा देकर इस संकट में नया मोड़ ला दिया है। रूस का यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है और अमेरिका की रणनीति को चुनौती दे सकता है।
राजनयिक स्तर पर भी स्थिति जटिल बनी हुई है। 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता विफल हो गई थी, जिसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। अब 16 अप्रैल को दूसरे दौर की वार्ता होने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन हालात को देखते हुए किसी ठोस समाधान की उम्मीद कम नजर आ रही है।
इसी बीच Donald Trump ने भारत के प्रधानमंत्री से बातचीत कर मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने में मदद मांगी है। बताया जा रहा है कि उन्होंने करीब 40 मिनट तक बातचीत कर India से होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाए रखने में सहयोग का आग्रह किया। यह दर्शाता है कि भारत की भूमिका इस क्षेत्रीय संकट में कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
तनाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। Israel और लेबनान के बीच भी झड़पें जारी हैं, जहां इजरायली सेना ने हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले किए हैं। वहीं, तुर्की और अन्य देशों में ईरान के समर्थन में प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं, जिससे यह संकट एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति जल्द नियंत्रित नहीं हुई, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें आने वाले कूटनीतिक प्रयासों और संभावित समझौते पर टिकी हैं, जो इस संकट को शांत कर सकते हैं या इसे और भड़का सकते हैं।

