मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंचता नजर आ रहा है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर सख्त नौसैनिक नाकेबंदी लागू करने का ऐलान किया है, जिसके बाद वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में उस समय उठाया गया, जब दोनों देशों के बीच चल रही शांति वार्ता विफल हो गई।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक 13 अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले जहाजों पर रोक लगा दी गई है। हालांकि सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे अन्य देशों के पोर्ट्स के लिए जहाजों को छूट दी गई है। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात को रोकना और उसकी आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया जा रहा है।
क्यों की गई नाकेबंदी?
अमेरिका का मानना है कि ईरान अपनी अर्थव्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर तेल निर्यात पर निर्भर है। अनुमान के मुताबिक ईरान रोजाना 1.5 से 2 मिलियन बैरल तेल निर्यात करता है। अमेरिका इस सप्लाई को रोककर ईरान पर दबाव बनाना चाहता है, ताकि वह क्षेत्रीय संघर्षों में अपनी भूमिका सीमित करे।
इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% गुजरता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यहां तनाव के कारण तेल आपूर्ति पहले ही प्रभावित हो चुकी है।
चीन पर सबसे बड़ा असर
इस नाकेबंदी का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है। चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और लगभग 90% ईरानी तेल वहीं जाता है। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह चीन तक ईरानी तेल की एक बूंद भी नहीं पहुंचने देगा।
इससे चीन में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि रूस ने चीन को वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति का भरोसा दिया है, लेकिन यह पूरी तरह से ईरान की कमी को पूरा कर पाएगा या नहीं, इस पर सवाल बने हुए हैं।
भारत और दुनिया पर असर
भारत भी इस स्थिति से अछूता नहीं रहेगा। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा इसी रूट से आता है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़े तो कच्चे तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ेगी और भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा।
मलक्का जलडमरूमध्य पर भी नजर
होर्मुज के बाद अब अमेरिका की नजर मलक्का जलडमरूमध्य पर भी है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक व्यापार का लगभग 40% गुजरता है।
अमेरिका ने इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर इस क्षेत्र में अपनी निगरानी मजबूत कर दी है। इसका मकसद चीन की सप्लाई चेन पर नियंत्रण रखना और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करना है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह नाकेबंदी सिर्फ एक क्षेत्रीय कदम नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ने वाला है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह तनाव किस दिशा में जाता है और क्या इससे वैश्विक आर्थिक संतुलन और ज्यादा प्रभावित होता है।

