16 Sep 2026, Wed

सुप्रीम कोर्ट 2022 की PIL पर सुनवाई को तैयार, चुनावी घोषणापत्र के वादों पर राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने की मांग

 

चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से किए जाने वाले वादों और चुनावी घोषणापत्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर पुरानी जनहित याचिका एक बार फिर चर्चा में है। 2022 में दाखिल इस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताई है। मामले में चुनावी घोषणापत्र को लेकर स्पष्ट नियम बनाने और उसमें किए गए वादों के लिए राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।

मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने रखा गया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। अदालत ने इस अनुरोध पर मामले को सूचीबद्ध करने पर सहमति दी है।

चुनावी घोषणापत्र को लेकर नियम बनाने की मांग

याचिका में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से चुनावी घोषणापत्र को लेकर एक स्पष्ट और व्यवस्थित व्यवस्था तैयार करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि घोषणापत्र चुनाव के बाद सरकार की नीतियों और योजनाओं को लेकर राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं को सामने रखते हैं। इसलिए उनमें किए जाने वाले महत्वपूर्ण वादों को लेकर जवाबदेही की व्यवस्था होनी चाहिए।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि राजनीतिक दल चुनावी घोषणापत्र में ऐसे वादे करते समय उनके आर्थिक प्रभाव और उन्हें पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधनों की जानकारी स्पष्ट रूप से दें। 2022 की संबंधित याचिकाओं में चुनावी वादों के वित्तीय प्रभाव और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले संभावित बोझ को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

वादे पूरे नहीं होने पर कार्रवाई का प्रस्ताव

याचिका में चुनावी घोषणापत्र में किए गए आवश्यक और तर्कसंगत वादों को पूरा नहीं करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसमें चुनाव चिन्ह जब्त करने और राजनीतिक दल की मान्यता या पंजीकरण रद्द करने जैसे कदमों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, ये याचिकाकर्ता की मांगें हैं और इन पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई के बाद ही होगा।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हर चुनावी वादा अनुचित नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे वादों को लेकर स्पष्ट मानदंड और नियम बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में किए गए वादों और उनके संभावित वित्तीय प्रभाव का आकलन किया जा सके।

पहले भी चुनावी घोषणापत्र पर बन चुके हैं दिशानिर्देश

चुनावी घोषणापत्र को लेकर पहले भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के लिए दिशानिर्देश तैयार किए हैं। आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, घोषणापत्र से जुड़े दिशा-निर्देशों को लेकर राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श किया गया था।

2022 में सुप्रीम कोर्ट के सामने दायर मामलों में मुफ्त सुविधाओं और चुनावी वादों के आर्थिक प्रभाव का मुद्दा भी उठा था। अदालत के रिकॉर्ड में राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव से पहले किए गए वादों के वित्तीय प्रभाव का उल्लेख है।

अब आगे क्या होगा?

अब 2022 की याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनावी घोषणापत्र को विनियमित करने, वादों की जवाबदेही तय करने और इस संबंध में नियम बनाने जैसे मुद्दे रखे जाएंगे। फिलहाल अदालत ने केवल मामले को सूचीबद्ध करने पर सहमति दी है। याचिका में की गई मांगों को स्वीकार या खारिज करने का कोई अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।

मामले की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को लेकर किस तरह की नियामक व्यवस्था की मांग पर अदालत विचार करती है।

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