14 May 2026, Thu

Bharat NCAP की 5-स्टार रेटिंग का क्या है असली सच? दोबारा क्रैश टेस्ट की गईं ये कारें, RTI से बड़ा खुलासा

भारत में नई कार खरीदते समय अब ग्राहकों की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक सेफ्टी रेटिंग बन चुकी है। ऑटोमोबाइल कंपनियां भी अपनी नई गाड़ियों के प्रचार में 5-स्टार सेफ्टी रेटिंग को प्रमुखता से दिखाती हैं। लेकिन अब एक RTI खुलासे ने भारत की वाहन सुरक्षा परीक्षण प्रणाली Bharat NCAP को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार Bharat NCAP के तहत अब तक 35 कार मॉडलों का क्रैश टेस्ट किया जा चुका है। सबसे अहम बात यह सामने आई है कि इन सभी गाड़ियों को टेस्टिंग के लिए खुद ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भेजा था। यानी अब तक सरकार की ओर से किसी भी कार मॉडल को स्वतः परीक्षण के लिए चयनित नहीं किया गया है, जबकि नियमों के अनुसार सरकार के पास यह अधिकार मौजूद है।

RTI में यह भी खुलासा हुआ कि कुछ कारों की फाइनल सेफ्टी रेटिंग जारी होने से पहले दोबारा टेस्टिंग या री-असेसमेंट किया गया। इस जानकारी के सामने आने के बाद कई लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या सेफ्टी रेटिंग पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से तय की जा रही है या नहीं।

जिन कारों की दोबारा टेस्टिंग किए जाने की बात सामने आई है, उनमें Maruti Suzuki Dzire, Tata Punch, Tata Sierra, Tata Curvv और Mahindra XUV 3XO शामिल हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन गाड़ियों की दोबारा टेस्टिंग किस कारण से की गई या पहले टेस्ट में क्या कमियां पाई गई थीं।

ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि किसी वाहन का री-असेसमेंट तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि ग्राहकों का भरोसा तभी बना रहेगा जब टेस्टिंग की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट और स्वतंत्र दिखाई दे।

Bharat NCAP की शुरुआत भारत में वाहनों की सुरक्षा को बेहतर बनाने और ग्राहकों को सुरक्षित कार चुनने में मदद देने के उद्देश्य से की गई थी। यह कार्यक्रम वैश्विक NCAP मॉडल की तर्ज पर तैयार किया गया है, जिसमें वाहनों की क्रैश क्षमता, यात्रियों की सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा जैसे पहलुओं का परीक्षण किया जाता है।

हालांकि RTI खुलासे के बाद यह बहस तेज हो गई है कि यदि कंपनियां खुद अपनी गाड़ियां टेस्टिंग के लिए भेज रही हैं, तो क्या इससे प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को भी बाजार से सीधे वाहन चुनकर उनका परीक्षण करना चाहिए, ताकि वास्तविक और स्वतंत्र परिणाम सामने आ सकें।

इस मुद्दे के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई यूजर्स का कहना है कि सेफ्टी रेटिंग ग्राहकों के लिए बेहद अहम होती है, इसलिए टेस्टिंग प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि किसी कार का दोबारा टेस्ट होता है तो उसके कारणों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता।

फिलहाल इस खुलासे ने भारत में वाहन सुरक्षा रेटिंग सिस्टम को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। आने वाले समय में सरकार और संबंधित एजेंसियों पर टेस्टिंग प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने का दबाव बढ़ सकता है।

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