14 May 2026, Thu

Buying vs Renting Home: 1 करोड़ का घर या 5 करोड़ की नेट वर्थ, किराये के घर में रहकर करोड़पति बनने का नया ट्रेंड कितना सही?

भारत में लंबे समय से अपना घर खरीदना लोगों का सबसे बड़ा सपना और आर्थिक लक्ष्य माना जाता रहा है। नौकरी लगते ही ज्यादातर लोग घर खरीदने और EMI भरने की योजना बनाने लगते हैं। लेकिन अब नई पीढ़ी के बीच एक अलग सोच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यह सोच कहती है कि घर खरीदने की बजाय किराए पर रहकर पैसे को निवेश करना ज्यादा समझदारी भरा फैसला हो सकता है। इसी को लेकर “रेंट एंड इन्वेस्ट” मॉडल आजकल चर्चा में है।

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि घर खरीदने में बड़ी रकम एक ही एसेट में फंस जाती है। इसके अलावा होम लोन की लंबी EMI, ब्याज और मेंटेनेंस खर्च भी व्यक्ति की बचत पर असर डालते हैं। वहीं अगर कोई व्यक्ति किराए के घर में रहता है और उसी रकम को म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार या दूसरे निवेश विकल्पों में लगाता है, तो लंबे समय में बड़ी संपत्ति बना सकता है।

उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति ₹1 करोड़ का घर खरीदने के बजाय उसी रकम को 12 से 13 प्रतिशत के औसत वार्षिक रिटर्न वाले निवेश साधनों में लगाता है, तो 20 से 25 साल में यह राशि कई गुना बढ़ सकती है। यही वजह है कि कई युवा प्रोफेशनल अब घर खरीदने की बजाय निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।

किराए पर रहने का सबसे बड़ा फायदा फ्लेक्सिबिलिटी माना जा रहा है। नौकरी बदलने, दूसरे शहर में शिफ्ट होने या बेहतर अवसर मिलने पर आसानी से स्थान बदला जा सकता है। इसके अलावा शुरुआती वर्षों में भारी EMI का दबाव नहीं रहता, जिससे व्यक्ति के पास अधिक लिक्विड कैश उपलब्ध रहता है। यही पैसा SIP, स्टॉक्स, रिटायरमेंट फंड या दूसरे निवेशों में लगाया जा सकता है।

हालांकि इस मॉडल के कुछ नुकसान भी हैं। किराया समय के साथ लगातार बढ़ता रहता है और लंबे समय बाद भी व्यक्ति के पास अपनी संपत्ति नहीं होती। कई लोगों के लिए “अपना घर” सिर्फ निवेश नहीं बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता का प्रतीक भी होता है। ऐसे में किराए पर रहना हर किसी को मानसिक संतोष नहीं दे पाता।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति हर व्यक्ति के लिए सही नहीं हो सकती। जिन लोगों की आय स्थिर है, निवेश की समझ अच्छी है और जो लंबे समय तक अनुशासित तरीके से निवेश कर सकते हैं, उनके लिए “रेंट और इन्वेस्ट” मॉडल बेहतर साबित हो सकता है। वहीं जो लोग स्थिर जीवन, पारिवारिक सुरक्षा और भविष्य की निश्चितता को ज्यादा महत्व देते हैं, उनके लिए घर खरीदना अभी भी सही विकल्प माना जा सकता है।

भारत में तेजी से बढ़ते प्रॉपर्टी रेट और ऊंची ब्याज दरों ने भी इस बहस को और तेज कर दिया है। महानगरों में घर खरीदना अब पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो चुका है। ऐसे में युवा वर्ग अपनी वित्तीय स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए नए विकल्प तलाश रहा है।

फाइनेंशियल प्लानर्स का मानना है कि घर खरीदने या किराए पर रहने का फैसला केवल भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति की आय, भविष्य की योजनाओं, निवेश क्षमता और जीवनशैली को ध्यान में रखकर लेना चाहिए। सही फैसला वही होगा जो लंबे समय में आर्थिक स्थिरता और मानसिक संतोष दोनों दे सके।

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