26 Mar 2026, Thu

Israel US Iran War: मिडिल-ईस्ट युद्ध के बीच भारत का बड़ा खेल, रुपये में शुरू कर दी खरीदारी; डॉलर का निकल रहा ‘तेल’

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत का बड़ा कदम: रुपये में तेल खरीदकर दुनिया को चौंकाया

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी Israel–US–Iran conflict के बीच भारत ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने वैश्विक तेल बाजार और वित्तीय व्यवस्था को चौंका दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने कच्चे तेल की खरीदारी में अमेरिकी डॉलर की बजाय रुपये का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इसे भारत की आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

रुपये में तेल खरीद, बदली वैश्विक रणनीति

जहां दुनिया के अधिकांश देश अब भी तेल खरीद के लिए डॉलर या युआन पर निर्भर हैं, वहीं भारत ने अपनी मुद्रा में भुगतान कर नई दिशा दिखाई है। भारतीय रिफाइनरियां अब खासतौर पर रूस से तेल खरीदते समय डॉलर पर निर्भरता कम कर रही हैं।

इस प्रक्रिया में रुपये को विदेशी खातों में जमा किया जाता है और बाद में उसे यूएई के दिरहम या चीनी युआन में परिवर्तित किया जाता है। यह व्यवस्था न केवल डॉलर आधारित सिस्टम से बचने में मदद करती है, बल्कि लेन-देन को भी आसान बनाती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और सप्लाई संकट

मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण Strait of Hormuz पर भी असर पड़ा है। यह मार्ग दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई का प्रमुख रास्ता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने कुछ देशों के जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाई है, जबकि भारत, रूस और चीन जैसे देशों को सीमित अनुमति दी जा रही है।

इस स्थिति ने वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित किया है, जिसके चलते कई देशों को भुगतान और परिवहन दोनों स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

भारत ने रूस से खरीदा भारी मात्रा में तेल

भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल आयात बढ़ा दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने अप्रैल 2026 के लिए करीब 6 करोड़ बैरल तेल की खरीद की है। यह कदम मिडिल ईस्ट में सप्लाई बाधित होने के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

यह भी देखा जा रहा है कि पहले कीमतों में बढ़ोतरी के कारण रूसी तेल आयात में थोड़ी गिरावट आई थी, लेकिन मौजूदा हालात में इसमें फिर तेजी आई है।

भारतीय बैंकों की अहम भूमिका

इस नई भुगतान व्यवस्था में भारतीय बैंकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। खासतौर पर वे बैंक जिनकी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति सीमित है, इस तरह के लेन-देन को आसान बना रहे हैं। रुपये को ओवरसीज अकाउंट्स में जमा कर बाद में अन्य मुद्राओं में बदलने की व्यवस्था से ट्रांजेक्शन सुरक्षित और प्रभावी बन रहा है।

डॉलर की पकड़ पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम डी-डॉलराइजेशन की दिशा में एक बड़ा संकेत है। इससे डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर हो सकती है और भारतीय रुपये को मजबूती मिल सकती है।

हाल के महीनों में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा था, लेकिन इस नई रणनीति से स्थिति बदलने की उम्मीद है।

निष्कर्ष

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत का रुपये में तेल खरीदने का फैसला उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। यह कदम न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन पर भी दीर्घकालिक असर डाल सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अन्य देश भी इस मॉडल को अपनाते हैं या नहीं

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