12 Jun 2026, Fri

‘हाउस वाइफ हर महीने कम से कम 30,000 का काम करती हैं, उन्हें होम मेकर नहीं, नेशन बिल्डर कहें’- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों की भूमिका और योगदान को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि उन्हें केवल “होममेकर” कहना उनके योगदान को सीमित करना होगा। अदालत ने कहा कि परिवार और समाज के निर्माण में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि उन्हें “नेशन बिल्डर” कहा जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय और उनके योगदान के आधार पर मुआवजा तय करने को लेकर भी अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि घर संभालने वाली महिलाओं का योगदान किसी भी कमाने वाले सदस्य से कम नहीं है। वे परिवार के संचालन, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों को निभाकर समाज की बुनियाद को मजबूत बनाती हैं। ऐसे में उनके कार्य का मूल्य केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं आंका जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना दावों में गृहिणियों के घरेलू कार्यों और देखभाल संबंधी सेवाओं के नुकसान को मुआवजे का एक अतिरिक्त आधार माना जाना चाहिए। कोर्ट का मानना है कि किसी गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार को केवल भावनात्मक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि उसके द्वारा किए जाने वाले अनगिनत घरेलू कार्यों का भी नुकसान उठाना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि एक गृहिणी द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए तो उनका आर्थिक मूल्य काफी अधिक होगा। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक गृहिणी का योगदान उच्च कोटि का और अमूल्य है। इसलिए उसकी भूमिका को केवल आय अर्जित करने वाले व्यक्ति से कमतर नहीं माना जा सकता।

यह फैसला वर्ष 2006 में उत्तराखंड में हुए एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में आया है। दुर्घटना में एक महिला की मौत हो गई थी। वाहन बीमित नहीं था, जिसके चलते वाहन मालिक ने पीड़ित परिवार को मुआवजा दिया था। हालांकि, महिला के पति और बेटे ने मुआवजे की राशि बढ़ाने की मांग की थी। उस समय न्यायाधिकरण ने महिला की काल्पनिक आय बहुत कम आंकी थी, जो एक दिहाड़ी मजदूर की आय से भी कम थी।

बाद में मामला उच्च न्यायालय पहुंचा, जहां भी मुआवजे में कोई विशेष राहत नहीं मिली। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि गृहिणियों की आय और योगदान का आकलन केवल न्यूनतम मजदूरी या काल्पनिक आय के आधार पर करना उचित नहीं है। उनके श्रम, समय, जिम्मेदारियों और परिवार के लिए किए गए त्याग को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा। इससे दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के परिवारों को अधिक न्यायसंगत मुआवजा मिलने का रास्ता खुलेगा।

अदालत की यह टिप्पणी न केवल महिलाओं के घरेलू योगदान को सम्मान देने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि राष्ट्र निर्माण में गृहिणियों की भूमिका को अब न्यायिक स्तर पर भी गंभीरता से स्वीकार किया जा रहा है। गृहिणियों को “नेशन बिल्डर” बताने वाली यह टिप्पणी समाज में उनके योगदान को नई पहचान देने का काम करेगी।

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