पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी दोनों से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। वहीं, राज्यसभा सांसद कोयल मलिक के भी जल्द इस्तीफा देने की खबर है। इन घटनाक्रमों ने मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
दोनों नेताओं के इस्तीफे का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि राज्यसभा चुनाव में अब केवल कुछ ही दिन शेष हैं। राजनीतिक गलियारों में पिछले कई दिनों से इन नेताओं की नाराजगी और पार्टी छोड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं। सुखेंदु शेखर रॉय ने पहले ही संकेत दिया था कि टीएमसी के कई सांसद पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट हैं और आने वाले समय में बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।
इन इस्तीफों के बाद राज्यसभा में टीएमसी सांसदों की संख्या 13 से घटकर 11 रह जाएगी। कोयल मलिक को हाल ही में राज्यसभा भेजा गया था और उनका कार्यकाल वर्ष 2032 तक है, जबकि सुखेंदु शेखर रॉय का कार्यकाल 2029 तक था। ऐसे में दोनों सीटों के खाली होने से उपचुनाव की स्थिति बनेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन सीटों पर होने वाले उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अवसर साबित हो सकते हैं। हालिया राजनीतिक समीकरणों और विधानसभा में बदलते शक्ति संतुलन को देखते हुए बीजेपी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। इसके अलावा टीएमसी के भीतर जारी असंतोष और संभावित क्रॉस वोटिंग भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
टीएमसी के लिए मुश्किलें केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं हैं। पिछले कुछ महीनों में पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता दिखाई दिया है। वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देकर नेतृत्व के सामने सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में पार्टी के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर अभद्र व्यवहार और अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगाया है।
इधर, विधानसभा में भी पार्टी को आंतरिक बगावत का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी के 57 विधायक पहले ही नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं और उन्होंने अपना अलग नेता चुन लिया है। इससे पार्टी के भीतर गहरे मतभेदों की तस्वीर सामने आई है। ममता बनर्जी द्वारा बुलाए गए कई महत्वपूर्ण बैठकों में भी बड़ी संख्या में विधायक शामिल नहीं हुए, जिससे असंतोष की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व जल्द ही असंतुष्ट नेताओं को मनाने और संगठन को एकजुट रखने में सफल नहीं हुआ, तो आने वाले समय में टीएमसी को और बड़े झटके लग सकते हैं। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी इस संकट से कैसे निपटती हैं और क्या पार्टी आगामी चुनावी चुनौतियों का मजबूती से सामना कर पाएगी।

