अमेरिका ने रूसी तेल पर प्रतिबंधों में दी अस्थायी छूट, भारत को बड़ी राहत
अमेरिका ने रूसी संघ मूल के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात से जुड़े प्रतिबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए अस्थायी छूट को बढ़ा दिया है। अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) ने घोषणा की है कि यह छूट अब 16 मई 2026 तक लागू रहेगी। इस फैसले से भारत सहित कई देशों को बड़ी राहत मिलने की संभावना है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से तेल आयात पर निर्भर हैं।
नई व्यवस्था के अनुसार, 17 अप्रैल 2026 या उससे पहले जहाजों पर लादे गए रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति होगी। यह अनुमति पूर्वी मानक समय के अनुसार 16 मई 2026 की आधी रात तक मान्य रहेगी। इसका अर्थ है कि मौजूदा शिपमेंट और पहले से तय डिलीवरी को बिना किसी बाधा के पूरा किया जा सकेगा।
अमेरिका के इस कदम को उसकी ऊर्जा प्रतिबंध नीति में एक अस्थायी लचीलापन माना जा रहा है। इससे पहले अमेरिका ने संकेत दिया था कि वह मार्च में जारी किए गए दो 30-दिवसीय लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं करेगा। इन लाइसेंसों के तहत रूस और ईरान से प्रतिबंधित ऊर्जा उत्पादों की सीमित खरीद की अनुमति दी गई थी। लेकिन अब नीति में बदलाव करते हुए रूस से ऊर्जा व्यापार के लिए एक नया 30-दिवसीय सामान्य लाइसेंस जारी किया गया है।
हालांकि, इस नई व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शर्त भी शामिल है। ईरान से ऊर्जा खरीद पर प्रतिबंध पहले की तरह लागू रहेगा और उसमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी गई है। इसका मतलब है कि केवल रूस से संबंधित ऊर्जा व्यापार को ही सीमित अवधि के लिए राहत दी गई है।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, यह नया सामान्य लाइसेंस पुराने अस्थायी लाइसेंस की जगह लेगा। इस निर्णय का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता बनाए रखना बताया जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत के लिए यह फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक है और हाल के वर्षों में उसने रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। इस छूट के चलते भारतीय तेल कंपनियों को न केवल आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी, बल्कि लागत पर भी नियंत्रण बनाए रखने में आसानी होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थायी स्थिरता ला सकता है, लेकिन लंबे समय में भू-राजनीतिक तनाव और प्रतिबंध नीति में बदलाव आगे भी अनिश्चितता बनाए रख सकते हैं। फिलहाल, भारत और अन्य आयातक देशों के लिए यह निर्णय एक राहत के रूप में देखा जा रहा है।

