पाकिस्तान में ‘अंतरराष्ट्रीय किसान संघर्ष दिवस’ के मौके पर किसानों ने देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं। Pakistan Kissan Rabita Committee (पीकेआरसी) के आह्वान पर हुए इस आंदोलन में 100 से अधिक शहरों के किसान सड़कों पर उतरे और कृषि नीतियों के खिलाफ जोरदार विरोध जताया।
राजधानी इस्लामाबाद समेत देश के कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शन देखने को मिला। लाहौर, मुल्तान, बहावलपुर, साहीवाल और सरगोधा जैसे पंजाब प्रांत के शहरों के अलावा हैदराबाद, सुक्कुर, लरकाना और ठट्टा में भी किसानों ने रैलियां निकालीं। वहीं पेशावर, स्वात, एबटाबाद और बन्नू सहित खैबर पख्तूनख्वा तथा क्वेटा, मस्तुंग और कलात जैसे बलूचिस्तान के क्षेत्रों में भी व्यापक विरोध दर्ज किया गया।
प्रदर्शनकारी किसानों की प्रमुख मांगों में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को 4,000 पाकिस्तानी रुपये प्रति मन तय करना शामिल है। किसानों का कहना है कि मौजूदा कीमतें उनकी लागत को भी पूरा नहीं कर पा रही हैं, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा किसानों ने सरकार की कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा देने वाली नीतियों का कड़ा विरोध किया और इसे छोटे किसानों के लिए खतरा बताया।
किसानों ने उस प्रस्ताव का भी विरोध किया, जिसमें गेहूं की खरीद का जिम्मा निजी कंपनियों को सौंपने की योजना है। उनका कहना है कि इससे बाजार पर कॉरपोरेट कंपनियों का नियंत्रण बढ़ेगा और छोटे तथा मध्यम किसानों की स्थिति और कमजोर हो जाएगी। प्रदर्शनकारियों ने बटाई पर खेती करने वाले किसानों को जारी बेदखली नोटिस को भी तुरंत वापस लेने की मांग की।
लाहौर में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए पीकेआरसी की महासचिव रिफ्फत मकसूद ने सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में सरकार की नीतियां किसानों के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हुई हैं। उनका आरोप था कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी कर रही है और कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दे रही है।
किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। उनका कहना है कि देश के किसान पहले से ही बढ़ती लागत, मौसम से जुड़ी चुनौतियों और फसलों के अस्थिर दामों से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार की मौजूदा नीतियां उनकी मुश्किलों को और बढ़ा रही हैं।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान में किसानों का यह व्यापक विरोध प्रदर्शन सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। आर्थिक संकट से जूझ रहे देश में यदि कृषि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर न सिर्फ किसानों बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

