कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बढ़ी चिंता, तेल कंपनियों पर भारी दबाव
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के सामने चुनौतियां और बढ़ गई हैं। ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी ग्रुप की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में आने वाले समय में ईंधन कीमतों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिससे देश वैश्विक बाजार में होने वाले हर उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाता है। इसी कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन इसके पीछे सरकारी तेल कंपनियों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) को पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 35 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान हो रहा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अप्रैल 2022 से खुदरा ईंधन कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, जबकि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। पहले रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया था, बाद में यह 70 डॉलर के आसपास आ गया, लेकिन हाल के भू-राजनीतिक तनावों के चलते यह फिर से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि जब वैश्विक कीमतें अपने चरम पर थीं, तब तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 2,400 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा था। हालांकि सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती के बाद यह घाटा घटकर करीब 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है। यह राहत उपभोक्ताओं तक सीधे न पहुंचकर कंपनियों के नुकसान को कम करने में उपयोग की जा रही है।
विश्लेषकों के अनुसार, जनवरी-मार्च तिमाही में कंपनियों को घाटा होने की आशंका है, क्योंकि मार्च में हुए नुकसान ने शुरुआती महीनों के मुनाफे को भी खत्म कर दिया है। मैक्वेरी की रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से प्रति लीटर नुकसान में लगभग 6 रुपये की वृद्धि हो सकती है।
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि चुनावी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
भारत अपनी 88 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरा करता है, जिससे आयात बिल पर भारी दबाव रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, टैक्स में कटौती का असर सरकार के राजस्व पर भी पड़ेगा। अगर एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह समाप्त की जाती है, तो सरकार को सालाना लगभग 3 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका है।
कुल मिलाकर, कच्चे तेल की वैश्विक अस्थिरता आने वाले समय में भारत के ईंधन बाजार, सरकारी कंपनियों और आम उपभोक्ताओं—तीनों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

