मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की खबरों के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन दावों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि उसके सभी आधिकारिक फैसले संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।
आयोग ने बुधवार को जारी अपने बयान में कहा कि उसके भीतर लिखित नोट, चर्चा, सुझाव और अलग-अलग राय सामने आना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम निर्णय आयोग के स्तर पर सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत एक रिपोर्ट में किए गए उन दावों के बाद हुई, जिनमें कहा गया कि चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कई मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार अलग-अलग मुद्दों पर सवाल उठाए।
इन कथित आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची से जुड़े डेटा और तकनीकी व्यवस्था के केंद्रीकरण तथा मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इन खबरों के जवाब में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करने वाली संस्था में निर्णय से पहले विचार-विमर्श होना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, किसी प्रस्ताव या ड्राफ्ट पर सदस्य सवाल, सुझाव या अपनी राय रख सकते हैं। इसे अंतिम निर्णय से पहले की आंतरिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
आयोग ने यह भी कहा कि केवल कुछ आंतरिक नोट्स को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया का आकलन करना उचित नहीं है। उसके मुताबिक, पिछले एक साल में कई चुनाव सुधार और नई पहल की गई हैं और SIR भी आयोग के सामूहिक निर्णयों का हिस्सा है। आयोग ने दावा किया कि SIR समेत उसके सभी अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी के साथ लिए गए हैं।
SIR पर विपक्ष ने उठाए सवाल
रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग की भूमिका और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। विपक्षी नेताओं ने कथित आपत्तियों को गंभीर बताते हुए चुनाव आयोग के फैसलों और SIR की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण की मांग की है।
वहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके कामकाज में आंतरिक चर्चा और अलग-अलग विचारों का होना अपने आप में किसी संस्थागत मतभेद का प्रमाण नहीं है। आयोग ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत निष्पक्ष तरीके से काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि चुनाव आयोग के भीतर हुई चर्चाओं और आपत्तियों को किस तरह समझा जाए। एक तरफ रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का हवाला दिया गया है, जबकि आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सामूहिक रूप से और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं। ऐसे में SIR से जुड़े फैसलों और आयोग की आंतरिक प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।

