भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने साफ कहा है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। अमेरिका की ओर से प्रतिबंधों और लगातार बढ़ते दबाव के बावजूद भारत ने संकेत दे दिए हैं कि रूस से तेल खरीद का फैसला पूरी तरह आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों के आधार पर लिया जाएगा।
दरअसल, अमेरिका ने समुद्री मार्ग से आने वाले रूसी तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई छूट की अवधि को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने सोमवार को जारी आदेश में कहा कि 17 अप्रैल 2026 या उससे पहले समुद्र में फंसे रूसी तेल पर प्रतिबंधों से राहत अब 17 जून 2026 तक लागू रहेगी। इससे पहले भी अप्रैल में इसी तरह की छूट को एक महीने के लिए बढ़ाया गया था।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा जारी सामान्य लाइसेंस 134C के तहत यह छूट दी गई है। हालांकि, इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ईरान, उत्तर कोरिया, क्यूबा और यूक्रेन के कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों से जुड़े लेनदेन को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
अमेरिका द्वारा दी गई इस छूट के बीच भारत ने साफ कर दिया है कि रूसी तेल की खरीद किसी अमेरिकी अनुमति पर निर्भर नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि भारत का तेल आयात पूरी तरह व्यावसायिक जरूरतों पर आधारित है और इसमें किसी बाहरी दबाव का कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय रिफाइनरियां हर परिस्थिति के लिए तैयार हैं और बाजार में कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है।
भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार कई देशों पर रूस के साथ व्यापार सीमित करने का दबाव बना रहे हैं। ट्रंप प्रशासन रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों को और सख्त बनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि मॉस्को की आय के प्रमुख स्रोतों पर असर डाला जा सके। इसके बावजूद भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ता कच्चा तेल मिलने के कारण भारत को बड़ा आर्थिक फायदा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से तेल आयात में उल्लेखनीय वृद्धि की है। इससे घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने और रिफाइनिंग सेक्टर को मजबूत करने में मदद मिली है। यही वजह है कि भारत इस आपूर्ति को अचानक रोकने के पक्ष में नहीं दिख रहा।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की नीति पूरी तरह संतुलित कूटनीति पर आधारित है। एक तरफ भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह रूस जैसे पुराने सहयोगियों के साथ आर्थिक और ऊर्जा साझेदारी को भी जारी रखना चाहता है।
सरकार के हालिया बयान से यह साफ हो गया है कि भारत फिलहाल रूस से तेल खरीद जारी रखने के पक्ष में है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। आने वाले समय में अमेरिका और रूस के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत की यह नीति वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

