कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत और ट्रांजिट बेल बढ़ाने की मांग को खारिज कर दिया और सुनवाई के दौरान उनके खिलाफ कड़ी नाराजगी भी जताई। अदालत ने साफ तौर पर निर्देश दिया कि खेड़ा को राहत के लिए सीधे असम की अदालत का रुख करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि खेड़ा गुवाहाटी की अदालत या हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हैं, तो वहां की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगी। कोर्ट ने उन्हें तत्काल असम जाकर अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल करने का निर्देश दिया।
इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से उस मुद्दे पर नाराजगी जताई, जिसमें हाईकोर्ट में गलत दस्तावेज दाखिल किए गए थे। जजों ने कहा कि किसी भी हालत में जाली या मनगढ़ंत दस्तावेज अदालत में पेश नहीं किए जा सकते। इसे “छोटी गलती” बताने पर भी कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई।
10 प्रमुख बिंदुओं में समझें क्या हुआ:
- सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा की ट्रांजिट जमानत बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया।
- अदालत ने कहा कि राहत के लिए उचित मंच असम की अदालत है, न कि दूसरी जगह।
- कोर्ट ने निर्देश दिया कि खेड़ा तुरंत असम जाकर अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करें।
- सुनवाई के दौरान गलत दस्तावेज दाखिल करने पर कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई।
- जजों ने कहा कि अदालत में जाली दस्तावेज पेश करना गंभीर मामला है।
- खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह “छोटी गलती” थी, जिसे सुधार लिया गया है।
- इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसी गलती को हल्के में कैसे लिया जा सकता है।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि गलत तथ्य पेश किए गए हैं।
- कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब मामला असम से जुड़ा है, तो तेलंगाना में याचिका क्यों दायर की गई।
- अंत में अदालत ने कहा कि असम की अदालत स्वतंत्र रूप से मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला करेगी।
सुनवाई के दौरान खेड़ा पक्ष ने यह भी दलील दी कि उन्हें कुछ दिनों की राहत दी जाए ताकि वे असम में याचिका दाखिल कर सकें, लेकिन कोर्ट इस पर सहमत नहीं हुआ। अदालत ने यह भी कहा कि याचिका दाखिल करने में देरी के लिए खुद खेड़ा जिम्मेदार हैं।
इस फैसले के साथ ही पवन खेड़ा को लगातार दो दिनों में दूसरा बड़ा झटका लगा है। उन्हें न तो गिरफ्तारी से सुरक्षा मिली और न ही ट्रांजिट बेल बढ़ाई गई। अब उनके पास एकमात्र विकल्प असम की अदालत में कानूनी राहत मांगने का बचा है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सही दस्तावेजों का पालन बेहद जरूरी है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

