24 Apr 2026, Fri

महाराष्ट्र के ऑटो ड्राइवरों को मराठी सिखाएगा मुंबई मराठी साहित्य संघ, ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर बोले- सरकार तैयार करेगी सिलेबस

महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य, मुंबई में लगे ‘मी मराठी बोलतो’ स्टिकर

मुंबई: महाराष्ट्र में स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य कर दिया है। Pratap Sarnaik ने साफ कहा है कि 1 मई, यानी Maharashtra Day से यह नियम प्रभावी रूप से लागू किया जाएगा। इसके तहत चालकों को भले ही मराठी लिखना-पढ़ना न आता हो, लेकिन यात्रियों से मराठी में संवाद करना जरूरी होगा।

इस फैसले के बाद Maharashtra Navnirman Sena (मनसे) ने मुंबई में अभियान शुरू कर दिया है। पार्टी के कार्यकर्ता शहरभर में ऑटो-रिक्शा पर स्टिकर लगा रहे हैं, जिनमें लिखा है—“मी मराठी बोलतो” (मैं मराठी बोलता हूं), “मला मराठी समजते” (मुझे मराठी समझ आती है) और “माझ्या रिक्षात तुम्ही बसू शकता” (आप मेरी ऑटो में बैठ सकते हैं)। इन स्टिकर्स का मकसद यात्रियों को यह बताना है कि चालक मराठी में बातचीत कर सकता है।

मनसे की मुंबई इकाई के अध्यक्ष Sandeep Deshpande ने कहा कि यह अभियान उन चालकों के खिलाफ है, जो मराठी में बात करने से इनकार करते हैं। उनके मुताबिक, “अब समय आ गया है कि ऐसे लोगों को सबक सिखाया जाए जो स्थानीय भाषा का सम्मान नहीं करते।”

सरकार इस फैसले को लागू करने के लिए सिर्फ नियम ही नहीं बना रही, बल्कि चालकों को भाषा सिखाने के लिए भी ठोस कदम उठा रही है। परिवहन मंत्री ने बताया कि एक विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा, जिससे गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों को मराठी सिखाई जा सके। इस दिशा में 24 अप्रैल को विशेषज्ञों, साहित्यकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक भी बुलाई गई है, जिसमें इस योजना के क्रियान्वयन पर चर्चा होगी।

इस पहल में Mumbai Marathi Sahitya Sangh और Konkan Marathi Sahitya Parishad जैसी संस्थाएं भी जुड़ रही हैं। ये संगठन राज्यभर में अपनी शाखाओं के जरिए ऑटो और टैक्सी चालकों को मराठी सिखाने का काम करेंगे। खासतौर पर कोंकण क्षेत्र में भाषा प्रशिक्षण पर जोर दिया जाएगा।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाया जाएगा। 1 मई से चालकों के दस्तावेजों और भाषा ज्ञान की जांच की जाएगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे मराठी समझते और बोलते हैं। इसके अलावा, यूनियन नेताओं के साथ भी बैठकें की जाएंगी, जिससे उनकी राय लेकर इस पहल को और प्रभावी बनाया जा सके।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब हाल ही में मराठी को “शास्त्रीय भाषा” का दर्जा मिला है। सरकार का मानना है कि इस फैसले से न केवल भाषा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यात्रियों और चालकों के बीच बेहतर संवाद भी स्थापित होगा।

हालांकि, इस निर्णय पर बहस भी शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे गैर-मराठी भाषी चालकों के लिए चुनौतीपूर्ण बता रहे हैं।

कुल मिलाकर, महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला राज्य में भाषा और पहचान के मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ले आया है, जिसका असर आने वाले समय में व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

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