नई दिल्ली: विश्व बैंक ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर जारी अपनी नवीनतम रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में देश की आर्थिक वृद्धि दर घटकर 6.6 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि यह पिछले वर्ष की 7.7 प्रतिशत वृद्धि दर से कम है, लेकिन इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
विश्व बैंक ने अपनी ‘ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स’ (Global Economic Prospects) रिपोर्ट में कहा है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और कच्चे माल की लागत में वृद्धि के कारण निजी मांग पर दबाव पड़ सकता है, जिससे आर्थिक विकास की गति कुछ धीमी हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक अनिश्चितताओं का असर भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल सकता है।
हालांकि विश्व बैंक ने भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027-28 में भारत की वृद्धि दर दोबारा बढ़कर 7.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका मुख्य कारण घरेलू मांग में मजबूती, निर्यात में संभावित वृद्धि और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले आर्थिक सुधारात्मक कदम बताए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष की शुरुआत में पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। देश में निजी खपत, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही है। इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में भी उपभोक्ता मांग में सुधार देखने को मिला है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिला है।
विश्व बैंक ने यह भी कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दरों में संभावित कटौती उपभोक्ता खर्च को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है। यदि करों में राहत दी जाती है तो बाजार में मांग को और मजबूती मिल सकती है, जिससे आर्थिक वृद्धि को सहारा मिलेगा।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि घरेलू बिक्री में वृद्धि के कारण कर संग्रह लगातार बढ़ रहा है। सरकार द्वारा ईंधन करों में कटौती और कृषि क्षेत्र में लागत संबंधी दबाव को कम करने के लिए उठाए गए कदमों का भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। इन उपायों से महंगाई को नियंत्रित करने और उपभोक्ताओं को राहत देने में मदद मिली है।
विश्व बैंक का मानना है कि अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में सुधार और संभावित मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के लागू होने से भारत के निर्यात क्षेत्र को भी लाभ मिल सकता है। इससे वैश्विक संघर्षों और बाहरी मांग में संभावित गिरावट के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलेगी।
दक्षिण एशिया के व्यापक परिदृश्य पर नजर डालें तो विश्व बैंक ने पूरे क्षेत्र की वृद्धि दर 2026 में घटकर 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, तेल और गैस की आपूर्ति में बाधाएं तथा पर्यटन और विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की मजबूत घरेलू मांग, निवेश क्षमता और सुधारवादी नीतियां देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखेंगी। यही कारण है कि विकास दर में मामूली गिरावट के बावजूद भारत दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने में सक्षम दिखाई देता है।

