दिल्ली दंगों से जुड़े 2020 के UAPA मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को फिलहाल जमानत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका पर फैसला सुरक्षित रखते हुए मामले को सीनियर बेंच के पास भेज दिया है। अब इस मामले की सुनवाई एक बड़ी और विशेष पीठ करेगी, जो UAPA कानून के तहत जमानत से जुड़े कानूनी सवालों पर स्पष्टता देगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत देने को लेकर अलग-अलग फैसलों में मतभेद दिखाई देते हैं, इसलिए इस मुद्दे पर एक स्पष्ट और एकरूप व्याख्या जरूरी है। इसी कारण चीफ जस्टिस से अनुरोध किया जाएगा कि इस मामले के लिए उपयुक्त बड़ी बेंच का गठन किया जाए।
कुछ आरोपियों को मिली अंतरिम जमानत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सह-आरोपी तसलीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को अंतरिम जमानत दे दी है। हालांकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर कोई अंतिम राहत नहीं दी गई है।
UAPA और जमानत को लेकर बहस
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि UAPA मामलों में जमानत से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है। कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि कानूनी स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि UAPA की धारा 43D(5) अदालत की जमानत देने की शक्ति को पूरी तरह खत्म नहीं करती। यदि कोई आरोपी लंबे समय से जेल में है और ट्रायल में देरी हो रही है, तो अदालत जमानत पर विचार कर सकती है।
केए नजीब केस का हवाला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केए नजीब केस का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी जमानत का आधार बन सकती है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल देरी ही पर्याप्त आधार नहीं हो सकती, आरोपी की भूमिका और सबूतों की प्रकृति भी देखी जाएगी।
आगे क्या होगा?
अब इस पूरे मामले की सुनवाई बड़ी बेंच करेगी, जो यह तय करेगी कि UAPA के तहत जमानत के मानक क्या होंगे और अलग-अलग फैसलों के बीच मतभेद को कैसे सुलझाया जाए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का रुख यह है कि इस संवैधानिक और कानूनी मुद्दे पर अंतिम स्पष्टता जरूरी है।

