12 Jun 2026, Fri

डॉक्टर से मिलने के बाद Google पर दौड़ते हैं दिल्ली-एनसीआर के लगभग 80% मरीज, स्टडी में हुआ खुलासा

नई दिल्ली: भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक नई स्टडी ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। अध्ययन के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के अधिकांश मरीज डॉक्टर से परामर्श लेने के बाद भी अपनी बीमारी, इलाज और आगे की प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग अतिरिक्त जानकारी के लिए गूगल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रहे हैं।

‘इंडिया पेशेंट नेविगेशन एंड कन्फ्यूजन इंडेक्स (IPNCI) 2026’ नामक इस अध्ययन में दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और गाजियाबाद के 1,000 लोगों को शामिल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 80 प्रतिशत मरीजों को भारत के हेल्थकेयर सिस्टम को समझने में कठिनाई हो रही है। उन्हें यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इलाज की अगली प्रक्रिया क्या होगी, किन जांचों की जरूरत है या किस विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

स्टडी में यह भी सामने आया कि 73.8 प्रतिशत मरीजों को डॉक्टर से परामर्श के दौरान जल्दबाजी का अनुभव हुआ। कई मरीजों का कहना था कि उन्हें अपनी बीमारी और उपचार से जुड़े सवाल पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। इसके परिणामस्वरूप 78.5 प्रतिशत लोगों ने डॉक्टर से मिलने के बाद इंटरनेट, गूगल या सोशल मीडिया पर अपनी बीमारी से जुड़ी जानकारी खोजी।

रिपोर्ट के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत मरीजों को यह जानकारी नहीं मिल पाई कि आगे कौन-से टेस्ट करवाने हैं या किस स्पेशलिस्ट के पास जाना चाहिए। वहीं 72 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें मरीज सहायता सेवाओं जैसे हेल्पडेस्क, पेशेंट कोऑर्डिनेटर, हेल्पलाइन या डिजिटल हेल्थ टूल्स का उपयोग करना नहीं आता या उनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है।

यह अध्ययन पैसिफिक वनहेल्थ हॉस्पिटल और इंडियन मेडिकल एकेडमी फॉर प्रिवेंटिव हेल्थ (IMAPH) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के हेल्थकेयर सिस्टम में मरीजों को सही दिशा देने वाली व्यवस्था अभी भी कमजोर है।

पैसिफिक वनहेल्थ हॉस्पिटल के संस्थापक साकेत बंसल ने कहा कि देश के स्वास्थ्य ढांचे में “मिसिंग मिडिल” की समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। मरीज प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं को छोड़कर सीधे बड़े निजी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। इससे न केवल इलाज का खर्च बढ़ रहा है, बल्कि बड़े अस्पतालों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 35.8 प्रतिशत मरीज सेकेंडरी हेल्थकेयर सुविधाओं को नजरअंदाज कर सीधे टर्शियरी केयर अस्पतालों में पहुंचे। दूसरी ओर, सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की सेवाएं अपेक्षाकृत सस्ती होने के बावजूद केवल 21.4 प्रतिशत लोगों ने उनका उपयोग किया।

IMAPH के सलाहकार बोर्ड सदस्य डॉ. मोहसिन वली का कहना है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती अब सिर्फ अस्पतालों और डॉक्टरों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीजों को सही मार्गदर्शन और भरोसेमंद जानकारी उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मरीजों को बेहतर काउंसलिंग, डिजिटल सहायता और स्पष्ट मार्गदर्शन मिले तो स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भ्रम की स्थिति काफी हद तक कम की जा सकती है। इससे न केवल मरीजों का अनुभव बेहतर होगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम की कार्यक्षमता भी बढ़ेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *