22 Aug 2026, Sat

‘ज्यादा सैलरी का मतलब बेहतर जीवन नहीं…’ गुड़गांव के एक फाउंडर ने बताई मेट्रो सिटी में रहने की असली ​कीमत; Video

गुड़गांव: महानगरों में नौकरी और बेहतर सैलरी को अक्सर सफलता और बेहतर जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन क्या ज्यादा कमाई का मतलब वास्तव में ज्यादा समृद्ध जीवन है? गुड़गांव स्थित एक कंपनी के फाउंडर सनी गर्ग ने सोशल मीडिया पर शेयर किए गए एक वीडियो में इसी सवाल को उठाया है। उन्होंने बताया कि दिल्ली-NCR, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में ज्यादा सैलरी मिलने के बावजूद जीवन-यापन की बढ़ती लागत और समय की कमी लोगों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है।

इंस्टाग्राम पर शेयर किया वीडियो

सनी गर्ग ने यह वीडियो इंस्टाग्राम पर @drsunnygarg नामक हैंडल से शेयर किया है। वीडियो में उन्होंने महानगर में रहने वाले 1.5 लाख रुपये मासिक कमाने वाले व्यक्ति का उदाहरण देते हुए बताया कि शुरुआत में 30-40 हजार रुपये का किराया ज्यादा बड़ा खर्च नहीं लगता। लेकिन जब रोजमर्रा के दूसरे खर्च जुड़ते हैं तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

उनके मुताबिक किराए के अलावा कैब, पेट्रोल, पार्किंग, घरेलू मदद, चाइल्डकेयर, फूड डिलीवरी, वीकेंड आउटिंग और परिवार से मिलने के लिए फ्लाइट जैसे खर्च भी बजट का बड़ा हिस्सा खा सकते हैं। ऐसे में ऊंची सैलरी होने के बावजूद बचत और वास्तविक जीवन स्तर उम्मीद के मुताबिक नहीं रह पाता।

‘महानगर सिर्फ घर का किराया नहीं वसूलता’

सनी गर्ग ने वीडियो में महानगर की जिंदगी की सबसे बड़ी लागत को समय बताया। उनका कहना है कि मेट्रो सिटी सिर्फ रहने की जगह का किराया नहीं वसूलता, बल्कि लोगों के समय की भी कीमत होती है।

ऑफिस के नजदीक रहने के लिए लोग ज्यादा किराया देते हैं। वहीं लंबे कामकाजी घंटों और ट्रैफिक के कारण खाना बनाने का समय नहीं मिलता तो लोग बाहर से खाना मंगाते हैं या घरेलू मदद लेते हैं। बच्चों की देखभाल और परिवार के साथ समय बिताना भी मुश्किल हो सकता है।

उनका तर्क है कि महानगर में रहने की लागत केवल बैंक खाते से निकलने वाले पैसों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर व्यक्ति के खाली समय और निजी जीवन पर भी पड़ता है।

टियर-2 शहरों से की तुलना

गर्ग ने महानगरों की तुलना टियर-2 शहरों से करते हुए कहा कि किसी छोटे शहर में 80-90 हजार रुपये कमाने वाला व्यक्ति कई बार बड़ा घर, कम ट्रैवल टाइम और परिवार के करीब रहने जैसी सुविधाएं हासिल कर सकता है। साथ ही कम खर्च के कारण उसकी बचत भी बेहतर हो सकती है।

वहीं, महानगर में 1.5 लाख रुपये कमाने वाले व्यक्ति को ज्यादा किराए और रोजमर्रा के खर्चों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में केवल सैलरी के आंकड़े से दोनों लोगों के जीवन स्तर की सही तुलना नहीं की जा सकती।

‘सिर्फ पैकेज नहीं, मिलने वाली जिंदगी देखें’

हालांकि सनी गर्ग ने महानगरों को खराब नहीं बताया। उन्होंने माना कि बड़े शहर बेहतर नौकरी के अवसर, मजबूत नेटवर्क, ऊंची सैलरी और तेज करियर ग्रोथ देते हैं। उनका कहना है कि फैसला लेते समय सिर्फ CTC या मासिक पैकेज को नहीं देखना चाहिए।

उन्होंने लोगों को सलाह दी कि यह भी समझना जरूरी है कि उस सैलरी के बदले उन्हें किस तरह की जिंदगी मिल रही है। उनके अनुसार, ज्यादा कमाई हमेशा ज्यादा समृद्ध जीवन की गारंटी नहीं होती। कई बार महानगर की सबसे बड़ी कीमत पैसा नहीं, बल्कि समय और निजी जिंदगी होती है। सनी गर्ग का यह वीडियो इसी सोच को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

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