नई दिल्ली: न्यायिक सेवा में करियर बनाने की तैयारी कर रहे कानून के छात्रों और युवा वकीलों को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा में शामिल होने के लिए अनिवार्य 3 साल की वकालत के अनुभव की शर्त को घटाकर 1 साल कर दिया है। यह फैसला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से सुनाया।
अदालत के इस फैसले से उन अभ्यर्थियों के लिए न्यायिक सेवा परीक्षा का रास्ता आसान होगा, जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यायिक अधिकारी बनने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, चयन के बाद उम्मीदवारों को प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
2025 के फैसले में 3 साल का अनुभव था जरूरी
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में न्यायिक सेवा की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए कानून के स्नातकों के लिए कम से कम 3 साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य किया था। इस फैसले के बाद नए कानून स्नातकों के लिए सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने का रास्ता बंद हो गया था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले में संशोधन करते हुए अनुभव की अवधि को घटाकर एक साल कर दिया है। अदालत के मुताबिक, एक साल की सक्रिय वकालत पूरी करने वाले अभ्यर्थी प्रवेश स्तरीय न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए पात्र होंगे।
एक साल की वकालत वालों को भी मिलेगा मौका
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जिन अभ्यर्थियों ने आवेदन करने के समय तक एक साल की सक्रिय वकालत पूरी कर ली है, उन्हें परीक्षा में बैठने का अवसर दिया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्रता के लिए मानी गई इस अवधि के समर्थन में उम्मीदवारों को अलग से वकालत का प्रमाणपत्र पेश करने की जरूरत नहीं होगी।
इस फैसले से उन युवा कानून स्नातकों को विशेष राहत मिलेगी, जो कम समय में न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी करना चाहते हैं।
चयन के बाद भी पूरी करनी होगी ट्रेनिंग
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि परीक्षा पास करना न्यायिक अधिकारी के रूप में तत्काल नियमित नियुक्ति की गारंटी नहीं होगी। चयनित अभ्यर्थियों को पहले एक साल के लिए प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया जाएगा।
इसके बाद उन्हें एक साल का निर्धारित न्यायिक प्रशिक्षण पूरा करना होगा। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य नए न्यायिक अधिकारियों को अदालत की कार्यप्रणाली और न्यायिक जिम्मेदारियों से व्यावहारिक रूप से परिचित कराना होगा।
प्रशिक्षु अधिकारियों को मिलेगा मानदेय
अदालत ने यह भी कहा कि प्रशिक्षण की अवधि के दौरान प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों को मानदेय दिया जाएगा। यह पारिश्रमिक संबंधित राज्य में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट को मिलने वाले वेतन के अनुरूप निर्धारित किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यायिक सेवा में जाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को कम अवधि के वकालत अनुभव के बाद परीक्षा में शामिल होने का अवसर मिलेगा। हालांकि, न्यायिक अधिकारी बनने से पहले उन्हें निर्धारित प्रशिक्षण और अन्य चयन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

