ईरान जंग के बाद गहराया ऊर्जा संकट, परमाणु ऊर्जा की ओर बढ़ते कदम
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हालिया संघर्षों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता तेज हो गई है। ईरान से जुड़े युद्ध हालातों ने तेल और गैस सप्लाई पर गहरा असर डाला है, जिससे एशिया, अफ्रीका ही नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका भी प्रभावित हुए हैं। इस संकट ने कई देशों को अपनी ऊर्जा रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, और अब परमाणु ऊर्जा एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता ने इस संकट को और गहरा किया है। एशिया, जो मध्य पूर्व के तेल और गैस का सबसे बड़ा उपभोक्ता रहा है, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई देश अब दीर्घकालिक समाधानों की तलाश में हैं, जिनमें परमाणु ऊर्जा प्रमुख रूप से शामिल है।
International Atomic Energy Agency के अनुसार, वर्तमान में दुनिया के 31 देश परमाणु ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं, जिससे वैश्विक बिजली की लगभग 10 प्रतिशत मांग पूरी होती है। वहीं, करीब 40 अन्य देश इस दिशा में कदम बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। यह संकेत देता है कि आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है।
एशिया और अफ्रीका के कई देश अब इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण कोरिया ने अपने परमाणु उत्पादन को बढ़ाने के संकेत दिए हैं, जबकि ताइवान अपने बंद पड़े रिएक्टरों को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहा है। वहीं अफ्रीकी देशों में केन्या, रवांडा और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भविष्य में परमाणु संयंत्र स्थापित करने की योजनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालांकि, परमाणु ऊर्जा को तुरंत समाधान नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, एक परमाणु संयंत्र विकसित करने में कई साल, यहां तक कि दशकों का समय लग सकता है। इसके बावजूद, इसे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक स्थायी विकल्प माना जा रहा है।
इस बीच, वैश्विक स्तर पर प्रभाव बढ़ाने की होड़ भी तेज हो गई है। रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम मिस्र में परमाणु रिएक्टर बना रही है और कई अफ्रीकी देशों के साथ समझौते कर चुकी है। वहीं अमेरिका भी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ा रहा है।
हालांकि परमाणु ऊर्जा के साथ जोखिम भी जुड़े हुए हैं। सुरक्षा, रेडियोधर्मी कचरे का प्रबंधन और युद्ध के दौरान संयंत्रों पर खतरा जैसे मुद्दे गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। इसके अलावा, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता देशों को यूरेनियम जैसे आयातित ईंधन पर निर्भर बना सकती है।
कुल मिलाकर, मौजूदा ऊर्जा संकट ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भविष्य में ऊर्जा के स्रोतों को विविध बनाना कितना जरूरी है। परमाणु ऊर्जा इस दिशा में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही है, लेकिन इसके साथ जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

