नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में अपना घर बनाने या जमीन खरीदने का सपना देश के कई लोगों का होता है। पहाड़ों में बढ़ते पर्यटन और निवेश के कारण इन राज्यों में प्रॉपर्टी खरीदने की मांग भी बढ़ी है। हालांकि, दूसरे राज्यों के लोगों के लिए यहां जमीन खरीदना इतना आसान नहीं है। खासकर कृषि और बागवानी भूमि को लेकर दोनों राज्यों में कई तरह के प्रतिबंध लागू हैं।
अगर आप भी हिमाचल प्रदेश या उत्तराखंड में जमीन या घर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो संबंधित राज्य के भूमि कानून और खरीदारी से पहले जरूरी मंजूरी की जानकारी होना बेहद जरूरी है। नियमों की अनदेखी करने पर बाद में कानूनी विवाद और सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश में धारा 118 का क्या है नियम?
हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीदने से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान हिमाचल प्रदेश काश्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 है। इस प्रावधान के तहत गैर-कृषक और बाहरी राज्यों के लोगों के लिए कृषि भूमि खरीदने पर कड़े प्रतिबंध हैं।
आम तौर पर दूसरे राज्य का व्यक्ति हिमाचल प्रदेश में सीधे कृषि या बागवानी जमीन नहीं खरीद सकता। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्य सरकार से अनुमति लेकर जमीन खरीदी जा सकती है।
यदि कोई बाहरी व्यक्ति हिमाचल में घर, होटल, होमस्टे या उद्योग के लिए जमीन खरीदना चाहता है तो उसे लागू नियमों के अनुसार सरकार से अनुमति लेने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे मामलों में संबंधित भूमि का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण होता है।
कुछ शहरी क्षेत्रों में बने-बनाए फ्लैट, अपार्टमेंट या व्यावसायिक संपत्ति के लिए नियम अलग हो सकते हैं। इसी तरह राज्य की आवासीय योजनाओं के तहत आवंटित संपत्ति पर भी अलग प्रावधान लागू हो सकते हैं।
उत्तराखंड में भी बाहरी लोगों पर कई प्रतिबंध
उत्तराखंड में भी जमीन खरीदने को लेकर नियमों को पिछले कुछ वर्षों में सख्त किया गया है। राज्य के मौजूदा भूमि कानूनों के तहत बाहरी राज्यों के लोगों के लिए विशेष रूप से कृषि और बागवानी भूमि खरीदने पर कड़े प्रतिबंध हैं।
राज्य के पहाड़ी जिलों में बाहरी व्यक्ति कृषि और बागवानी भूमि खरीद नहीं सकता। वहीं, आवासीय जमीन खरीदने के लिए भी निर्धारित सीमाएं और शर्तें लागू हैं।
कुछ परिस्थितियों में दूसरे राज्य का परिवार नगर निकाय या शहरी क्षेत्र से बाहर अधिकतम 250 वर्ग मीटर आवासीय भूमि खरीद सकता है। इसके लिए रजिस्ट्रेशन के समय संबंधित अधिकारी के सामने जरूरी घोषणा या शपथ-पत्र देना पड़ सकता है।
खरीदार को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उसके नाम उत्तराखंड में पहले से ऐसी कोई जमीन दर्ज न हो, जहां नियमों के तहत प्रतिबंध लागू है। गलत जानकारी या नियमों का उल्लंघन सामने आने पर जमीन पर सरकारी कार्रवाई हो सकती है।
जमीन खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
पहाड़ी राज्यों में प्रॉपर्टी खरीदते समय सिर्फ विक्रेता और खरीदार के बीच समझौता काफी नहीं है। जमीन का भू-उपयोग, क्षेत्र, मालिकाना हक, जमीन की श्रेणी और स्थानीय कानून की जांच करना बेहद जरूरी है।
किसी भी जमीन के लिए टोकन मनी या एडवांस देने से पहले यह पता कर लेना चाहिए कि उस जमीन को खरीदने के लिए आपको किसी सरकारी अनुमति की जरूरत है या नहीं। साथ ही जमीन के रिकॉर्ड और पिछले लेनदेन की भी जांच करनी चाहिए।
गलत तरीके से जमीन खरीदना पड़ सकता है भारी
यदि किसी व्यक्ति ने प्रतिबंधित भूमि नियमों को दरकिनार कर जमीन खरीदी या रजिस्ट्रेशन के दौरान गलत जानकारी दी, तो भविष्य में उसकी खरीद पर सवाल उठ सकता है। कुछ मामलों में सरकारी स्तर पर जमीन जब्त करने जैसी कार्रवाई भी हो सकती है।
इसलिए हिमाचल प्रदेश या उत्तराखंड में जमीन खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए सबसे जरूरी सलाह यही है कि एडवांस देने या रजिस्ट्री कराने से पहले स्थानीय राजस्व अधिकारी, सब-रजिस्ट्रार और योग्य प्रॉपर्टी/कानूनी विशेषज्ञ से मौजूदा नियमों की पुष्टि जरूर करें। नियम समय-समय पर बदल सकते हैं, इसलिए खरीद के समय लागू कानून की जांच करना जरूरी है।

