6 Oct 2026, Tue

‘वो ऋतिक रोशन है’, रजनीकांत की ‘जेलर 2’ का ट्रेलर रिलीज होते ही बढ़ा सस्पेंस, एक झलक देख फैंस में मची खलबली

मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने मुस्लिम समुदाय में सामाजिक सुधार की जरूरत को लेकर बेबाक टिप्पणी की है। उन्होंने तत्काल तीन तलाक की प्रथा का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि किसी सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के लिए सरकार के हस्तक्षेप का इंतजार क्यों किया जाए। उनका कहना है कि किसी भी समुदाय के भीतर सुधार की शुरुआत उसी समाज के लोगों से होनी चाहिए।

एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ और सामाजिक सुधार से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखी। उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी प्रथा में बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो उसके खिलाफ आवाज समुदाय के भीतर से क्यों नहीं उठाई जाती। उनके मुताबिक, दूसरों की कमियों पर सवाल उठाने से पहले अपने समाज के भीतर मौजूद समस्याओं को पहचानना और उन्हें दूर करने की कोशिश करना जरूरी है।

ट्रिपल तलाक पर उठाया सवाल

जावेद अख्तर ने तत्काल तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए जाने का जिक्र करते हुए सवाल किया कि इस सामाजिक प्रथा में बदलाव की पहल पहले समुदाय के भीतर से क्यों नहीं हुई। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद लंबे समय तक इस व्यवस्था में सुधार को लेकर पर्याप्त पहल क्यों नहीं की गई।

उनकी टिप्पणी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ, सामाजिक सुधार और धर्मनिरपेक्षता को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि अगर समाज के भीतर किसी व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, तो इसके लिए सरकार के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा क्यों की जाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदली कानूनी स्थिति

तत्काल तीन तलाक को लेकर देश में लंबे समय तक कानूनी बहस चली। 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया था। इसके बाद इस प्रथा को कानूनी रूप से प्रतिबंधित करने की दिशा में केंद्र सरकार ने कदम उठाए।

जुलाई 2019 में संसद ने मुस्लिम महिलाओं के विवाह संबंधी अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा कानून पारित किया। इस कानून के तहत तत्काल तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखा गया। इसके बाद किसी महिला को तत्काल तीन तलाक देने की प्रथा पर कानूनी रोक लागू हो गई।

‘पहले अपना घर सुधारें’

जावेद अख्तर ने अपनी बात रखते हुए सामाजिक सुधार के व्यापक मुद्दे पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि किसी भी समुदाय में मौजूद गलत प्रथाओं या सामाजिक समस्याओं पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी उस समाज के लोगों की भी है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दूसरों की आलोचना करने से पहले अपने समाज के भीतर सुधार की कोशिश होनी चाहिए। उनके मुताबिक, समाज तभी मजबूत बनता है जब उसके लोग अपनी कमियों को स्वीकार करने और उन्हें बदलने की दिशा में कदम उठाते हैं।

उनकी इस टिप्पणी के बाद एक बार फिर सामाजिक सुधार, व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है। जावेद अख्तर अपने स्पष्ट और बेबाक विचारों के लिए जाने जाते हैं और इस बार भी उनकी टिप्पणी ने एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे पर नई चर्चा को जन्म दिया है।

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