15 May 2026, Fri

रामानंद सागर का TV शो, ‘रामायण’-‘महाभारत’ से बिल्कुल अलग, फिर भी आसमान छूती थी दीवानगी, 8.3 है रेटिंग

भारतीय टेलीविजन के इतिहास में कुछ ऐसे शो रहे हैं जिन्होंने अपनी सादगी, कहानी और प्रस्तुति से दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी है। 80 और 90 के दशक का समय ऐसा था जब टीवी मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन था और पूरे परिवार एक साथ बैठकर धारावाहिक देखा करते थे। इसी दौर में एक ऐसा अनोखा शो आया, जिसने अपनी रहस्यमयी कहानियों और नैतिक संदेशों के कारण अलग पहचान बनाई। इस शो का नाम था “विक्रम और बेताल”

यह धारावाहिक भारतीय लोककथाओं पर आधारित था, जिसमें राजा विक्रमादित्य और बेताल की दिलचस्प कहानियों को दिखाया गया था। हर एपिसोड में एक नई कहानी होती थी, जिसमें बेताल राजा विक्रम के सामने एक जटिल प्रश्न रखता था। राजा को सही उत्तर देना होता था, लेकिन यदि वह जवाब देते समय गलती कर देता तो बेताल फिर से अपनी शर्त के अनुसार वापस पेड़ पर लटक जाता था। यह “अगर तू बोलेगा तो मैं चला जाऊंगा” वाला ट्विस्ट दर्शकों को अंत तक बांधे रखता था।

इस शो की सबसे खास बात इसकी कहानी कहने की शैली थी। हर कहानी केवल मनोरंजन नहीं करती थी, बल्कि उसमें एक गहरा नैतिक संदेश भी छिपा होता था। न्याय, बुद्धिमानी, धर्म और कर्तव्य जैसे विषयों को बहुत सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया था, जिससे बच्चे और बड़े दोनों ही इससे जुड़ाव महसूस करते थे।

इस शो को महान निर्माता रामानंद सागर के विजन से जोड़ा जाता है, जबकि इसका निर्देशन उनके पुत्र प्रेम सागर ने किया था। इस धारावाहिक में कई ऐसे कलाकार भी नजर आए जिन्होंने आगे चलकर भारतीय टीवी इतिहास में बड़ी पहचान बनाई। इनमें अरुण गोविल, सुनील लहरी, दीपिका चिखलिया और अरविंद त्रिवेदी जैसे नाम शामिल थे।

कुल मिलाकर इस शो में लगभग 26 एपिसोड प्रसारित किए गए थे और हर एपिसोड अपने आप में एक अलग कहानी लेकर आता था। सीमित तकनीक और साधनों के बावजूद इसका प्रस्तुतीकरण बेहद प्रभावशाली था। खासकर बेताल के किरदार का लुक और उसके उड़ने वाले दृश्य उस समय के दर्शकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थे।

आज भी यह शो लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए हुए है और इसे आधुनिक प्लेटफॉर्म्स पर भी देखा जाता है। इसकी IMDb रेटिंग 8.3 इसकी स्थायी लोकप्रियता को दर्शाती है। यह सिर्फ एक टीवी शो नहीं था, बल्कि भारतीय लोककथाओं को एक नए अंदाज में पेश करने का एक सफल प्रयास था, जिसने पीढ़ियों को जोड़ने का काम किया।

“विक्रम और बेताल” आज भी उस दौर की याद दिलाता है जब कहानी में तकनीक कम और भावनाओं की ताकत ज्यादा होती थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *