28 May 2026, Thu

चुनाव आयोग के पास SIR करने का अधिकार है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट आज सुनाएगा अहम फैसला

नई दिल्ली: देश की चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची प्रबंधन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आज सुप्रीम कोर्ट अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाने जा रहा है। मामला चुनाव आयोग द्वारा कराए जाने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता से जुड़ा है। इस फैसले पर राजनीतिक दलों, चुनाव विशेषज्ञों और लाखों मतदाताओं की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होगा कि चुनाव आयोग को मौजूदा स्वरूप में SIR कराने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है या नहीं।

मामले की सुनवाई कर रही पीठ का नेतृत्व Justice Surya Kant कर रहे हैं, जबकि उनके साथ Justice Joymalya Bagchi भी शामिल हैं। दोनों न्यायाधीशों की पीठ याचिकाओं के एक समूह पर फैसला सुनाएगी, जिनमें चुनाव आयोग की ओर से विभिन्न राज्यों में कराए गए SIR की वैधता को चुनौती दी गई है।

विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि क्या Election Commission of India को संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे संबंधित नियमों के तहत विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का अधिकार प्राप्त है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि SIR की प्रक्रिया मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, इसलिए इसकी वैधता और दायरे को लेकर स्पष्टता आवश्यक है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। तब से देशभर में इस फैसले का इंतजार किया जा रहा था। गौरतलब है कि अदालत ने सुनवाई के दौरान SIR प्रक्रिया पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई थी। इसके चलते बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान समेत कुछ राज्यों में यह अभी भी जारी है।

इस मामले में कई प्रमुख याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इनमें Association for Democratic Reforms, राजनीतिक विश्लेषक Yogendra Yadav, Mahua Moitra, Manoj Jha, K. C. Venugopal और Supriya Sule समेत कई अन्य नेता और सामाजिक संगठन शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने आधार कार्ड को लेकर भी एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कहा था कि आधार कार्ड को पहचान संबंधी दस्तावेजों की सूची में शामिल किया जाए, ताकि मतदाता इसे पहचान प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर सकें। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। साथ ही चुनाव आयोग को आधार की सत्यता और प्रामाणिकता की जांच करने का अधिकार भी दिया गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज आने वाला फैसला देश की चुनावी व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। यदि अदालत चुनाव आयोग की शक्तियों को बरकरार रखती है, तो भविष्य में SIR प्रक्रिया को और मजबूती मिल सकती है। वहीं यदि अदालत कुछ सीमाएं निर्धारित करती है, तो चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रियाओं में बदलाव करना पड़ सकता है।

फिलहाल पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण फैसले पर है, जो चुनावी पारदर्शिता, मतदाता अधिकारों और चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों को लेकर नई दिशा तय कर सकता है।

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