अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। पिछले एक सप्ताह से दबाव में चल रहे क्रूड ऑयल के भाव में करीब 16 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गई है। वहीं, अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतों में भी बड़ी गिरावट आई है। तेल की कीमतों में इस बदलाव के पीछे वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों में सुधार की उम्मीद, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की संभावना और कच्चे तेल की सप्लाई में बढ़ोतरी को प्रमुख वजह माना जा रहा है।
94 डॉलर से नीचे पहुंचा ब्रेंट क्रूड
गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 97 सेंट यानी 1.03 फीसदी गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमत 1.14 डॉलर यानी 1.29 फीसदी की गिरावट के साथ 86.98 डॉलर प्रति बैरल रह गई।
इससे पहले कारोबारी सत्र में भी दोनों प्रमुख बेंचमार्क की कीमतों में 8 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी। इसके चलते कच्चे तेल के भाव अगस्त के अंत के बाद अपने निचले स्तर पर पहुंच गए। महज एक सप्ताह में करीब 16 फीसदी की गिरावट ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है।
अमेरिका की राजनीतिक परिस्थितियों का दिखा असर
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों के नतीजों को माना जा रहा है। चुनाव में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की मजबूत स्थिति के बाद निवेशकों को उम्मीद है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
बाजार में यह संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में सैन्य टकराव के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने की कोशिश हो सकती है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी फिलहाल ईरान पर तत्काल हमले की योजना नहीं होने के संकेत दिए गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में युद्ध की आशंका कम हुई है और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
मिडिल ईस्ट से सप्लाई में सुधार
तेल की कीमतों में गिरावट की दूसरी महत्वपूर्ण वजह पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की आपूर्ति में सुधार है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रही है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस मार्ग से सप्लाई बेहतर होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ने लगी है। बाजार विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक, खाड़ी देशों से अतिरिक्त सप्लाई आने से वैश्विक बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बदल रहा है। सितंबर और अक्टूबर के दौरान अतिरिक्त तेल आपूर्ति में बढ़ोतरी के अनुमान भी सामने आए हैं।
भारत के लिए क्या हो सकता है फायदा?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने से देश के आयात बिल और विदेशी मुद्रा खर्च पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा तुरंत पेट्रोल और डीजल की कीमतों में देखने को मिले, यह जरूरी नहीं है। घरेलू ईंधन की कीमतों पर रुपये-डॉलर की विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और अन्य कारकों का भी असर पड़ता है।
अब निवेशकों और आम लोगों की नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें किस दिशा में आगे बढ़ती हैं।

