7 Aug 2026, Fri

National Handloom Day 2026 पर जान लें किस राज्य की कौन सी हैंडलूम साड़ी फेमस है, इसे किस नाम से जाना जाता है

नई दिल्ली: भारत की सांस्कृतिक विरासत में हैंडलूम का विशेष स्थान है। हर साल 7 अगस्त को नेशनल हैंडलूम डे मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य देश के बुनकरों, कारीगरों और पारंपरिक हथकरघा उद्योग को सम्मान देना है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से हैंडलूम उत्पादों को अपनाने और स्थानीय कारीगरों का समर्थन करने की अपील की है।

भारत के गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी लाखों बुनकर अपने हाथों से कपड़ों और साड़ियों की बुनाई करते हैं। यही कारण है कि भारतीय हैंडलूम सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कला, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों की अपनी विशिष्ट हैंडलूम साड़ियां हैं, जिन्हें उनकी बुनाई, डिजाइन और कारीगरी के लिए दुनिया भर में पहचान मिली है।

उत्तर प्रदेश की बनारसी सिल्क

उत्तर प्रदेश की बनारसी सिल्क साड़ी भारतीय हैंडलूम की सबसे प्रसिद्ध साड़ियों में गिनी जाती है। वाराणसी में तैयार होने वाली इन साड़ियों पर सोने और चांदी के जरी धागों से बेहद बारीक काम किया जाता है। ब्रोकेड, जरी और पारंपरिक मोटिफ वाली बनारसी साड़ियों को तैयार करने में कई बार महीनों का समय लग जाता है। शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर इन साड़ियों की मांग सबसे अधिक रहती है।

गुजरात की पटोला साड़ी

गुजरात की पटोला साड़ी अपनी डबल इकत बुनाई तकनीक के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस साड़ी की खासियत यह है कि इसमें धागों को पहले रंगा जाता है और फिर बेहद सटीक डिजाइन के साथ बुना जाता है। पटोला की एक साड़ी तैयार करने में लंबा समय लगता है, इसलिए इसे भारतीय हस्तशिल्प की अनमोल धरोहर माना जाता है।

राजस्थान की लहरिया और बांधनी

राजस्थान की लहरिया, टाई एंड डाई और बांधनी साड़ियां रंगों की खूबसूरती और पारंपरिक डिजाइन के लिए जानी जाती हैं। हाथ से बांधकर और रंगकर तैयार की जाने वाली इन साड़ियों में राजस्थान की लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है। त्योहारों और पारंपरिक आयोजनों में इनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है।

मध्य प्रदेश की चंदेरी, छत्तीसगढ़ की कोसा सिल्क

मध्य प्रदेश की चंदेरी साड़ी हल्के वजन, महीन बुनाई और रेशमी चमक के लिए प्रसिद्ध है। चंदेरी में साड़ियों के साथ-साथ सूट और दुपट्टे भी हाथ से बुने जाते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ की कोसा सिल्क साड़ी प्राकृतिक रेशम से तैयार होती है और अपनी मजबूती तथा सुंदर बनावट के कारण खास पहचान रखती है।

पंजाब और हरियाणा की पारंपरिक बुनाई

पंजाब की फुलकारी कढ़ाई भारतीय हस्तशिल्प की एक महत्वपूर्ण कला है। फुलकारी का काम साड़ियों, दुपट्टों और अन्य वस्त्रों पर हाथ से किया जाता है। हरियाणा की रेशम धुरिया साड़ी हल्के सिल्क और पारंपरिक बुनाई के लिए जानी जाती है।

बिहार और झारखंड की टसर सिल्क

बिहार की भागलपुरी टसर सिल्क साड़ी अपनी प्राकृतिक बनावट और शाही लुक के लिए प्रसिद्ध है। भागलपुर को सिल्क सिटी भी कहा जाता है। वहीं झारखंड की आदिवासी टसर सिल्क साड़ियां स्थानीय बुनकरों की पारंपरिक कला का बेहतरीन उदाहरण हैं।

नेशनल हैंडलूम डे केवल एक दिवस नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरों की मेहनत और परंपरा को सम्मान देने का अवसर है। यदि हम हैंडलूम उत्पादों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल स्थानीय बुनकरों को रोजगार मिलेगा, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेगी।

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