29 May 2026, Fri

Munawwar Rana Shayari: घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं…यहां पढ़ें मुनव्वर राना की मशहूर शायरी

नई दिल्ली: उर्दू शायरी की दुनिया में मुनव्वर राना एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें उनकी सादगी, भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिल को छू लेने वाले अंदाज के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने अपनी शायरी के जरिए रिश्तों, मोहब्बत, जुदाई, इंसानी जज्बात और खासतौर पर ‘मां’ के प्रेम को बेहद खूबसूरती से शब्दों में पिरोया। यही वजह है कि उनकी रचनाएं सिर्फ साहित्य प्रेमियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम लोगों के दिलों तक भी पहुंचीं।

मुनव्वर राना का जन्म 26 नवंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुआ था। उन्होंने उर्दू शायरी को नई पहचान दी और अपनी सहज भाषा के कारण हर वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल की। उनकी शायरी में जीवन के अनुभव, रिश्तों की गर्माहट और भावनाओं की गहराई साफ झलकती है।

मुनव्वर राना को सबसे ज्यादा पहचान मां पर लिखी गई उनकी शायरियों से मिली। उनका मशहूर शेर, “किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई” आज भी लोगों के दिलों में विशेष स्थान रखता है। इस एक शेर ने उन्हें देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाई।

उनकी शायरी सिर्फ मां तक सीमित नहीं थी। उन्होंने दोस्ती, जुदाई, इंसानी रिश्तों और समाज की सच्चाइयों को भी बेहद खूबसूरती से बयां किया। उनके कई शेर आज भी सोशल मीडिया से लेकर मुशायरों तक खूब सुनाए जाते हैं।

उनके कुछ मशहूर शेरों में शामिल है:

“अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करो,
तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो।”

यह शेर जुदाई के दर्द और बिछड़ने के बाद भी यादों के साथ जीने की भावना को बखूबी बयान करता है।

“हमारी दोस्ती से दुश्मनी शर्माई रहती है,
हम अकबर हैं हमारे दिल में जोधाबाई रहती है।”

यह शेर प्रेम, सौहार्द और रिश्तों की खूबसूरती को दर्शाता है।

“मुझे भी उस की जुदाई सताती रहती है,
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है।”

मां और बेटे के रिश्ते की गहराई को व्यक्त करने वाला यह शेर आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है।

“शायद जली हैं फिर कहीं नज़दीक बस्तियाँ,
गुज़रे हैं कुछ परिंदे इधर से डरे हुए।”

यह शेर समाज और समय की परिस्थितियों पर संवेदनशील टिप्पणी करता है।

“हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहाँ,
हम न होंगे तो क्या कमी होगी।”

जीवन की अस्थिरता और इंसान की वास्तविकता को समझाने वाला यह शेर बेहद लोकप्रिय है।

“देखना है तुझे सहरा तो परेशाँ क्यूँ है,
कुछ दिनों के लिए मुझ से मिरी आँखें ले जा।”

इस शेर में प्रेम, अनुभव और संवेदनाओं की गहराई साफ दिखाई देती है।

मुनव्वर राना भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी और विचार हमेशा जिंदा रहेंगे। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी और उर्दू साहित्य में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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