31 Oct 2026, Sat
Breaking

ISRO ने की NVS-03 की सफल लॉन्चिंग, GSLV-F18 व्हीकल ने श्रीहरिकोटा से भरी उड़ान; जानें इस सैटेलाइट की खासियत

भारत ने अंतरिक्ष और नेविगेशन तकनीक के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अगली पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस सैटेलाइट को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया। लॉन्च के बाद सैटेलाइट को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया गया। इस मिशन से भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

GSLV-F18 रॉकेट से भरी उड़ान

NVS-03 सैटेलाइट को शुक्रवार रात 11 बजकर 51 मिनट पर लॉन्च किया गया। इसके लिए लगभग 50 मीटर ऊंचे और तीन चरणों वाले GSLV-F18 रॉकेट का इस्तेमाल किया गया। लॉन्च के समय रॉकेट का कुल वजन लगभग 420 टन था। इसका प्रमुख उद्देश्य करीब 2,232 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा तक पहुंचाना था।

मिशन के तहत सैटेलाइट को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस कक्षा की पृथ्वी से न्यूनतम दूरी लगभग 170 किलोमीटर और अधिकतम दूरी लगभग 37,023 किलोमीटर है। कक्षा का झुकाव 20.75 डिग्री बताया गया है। यह शुरुआती कक्षा सैटेलाइट को आगे उसकी निर्धारित परिचालन कक्षा तक पहुंचाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

क्या है NVS-03 सैटेलाइट की खासियत?

NVS-03 भारत की अगली पीढ़ी की नेविगेशन सैटेलाइट श्रृंखला का हिस्सा है। इसका उद्देश्य देश की स्वदेशी उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली NavIC की क्षमताओं को बेहतर बनाना है। इस प्रणाली की मदद से उपयोगकर्ताओं को स्थान, दिशा और समय से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।

नेविगेशन सेवाएं आज परिवहन, सड़क मार्गों पर दिशा बताने, समुद्री गतिविधियों, आपातकालीन सेवाओं और कई अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बेहतर उपग्रह आधारित सेवाओं से इन क्षेत्रों में सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, NVS-03 के परिचालन लाभ उसके कक्षा में पहुंचने, जांच और सिस्टम में शामिल किए जाने की प्रक्रिया पर भी निर्भर करेंगे।

NVS-02 मिशन से मिली सीख के बाद किए गए बदलाव

इस मिशन का एक महत्वपूर्ण पहलू सैटेलाइट के ईंधन आपूर्ति तंत्र से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था है। जनवरी 2025 में लॉन्च किए गए NVS-02 सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा तक पहुंचाने में समस्या आई थी। उस मिशन में प्रणोदन प्रणाली से संबंधित तकनीकी दिक्कत सामने आई थी, जिसके कारण सैटेलाइट को उसकी अपेक्षित परिचालन कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।

इसके बाद नए मिशन में कुछ तकनीकी व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, NVS-03 में पायरो तकनीक से संचालित वाल्व लॉन्च से पहले ही खोलने की विशेष व्यवस्था अपनाई गई। इस तरह के बदलाव का उद्देश्य लॉन्च के दौरान आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सैटेलाइट की प्रणोदन प्रणाली के संचालन को अधिक भरोसेमंद बनाना है।

भारत की नेविगेशन क्षमता को मिलेगा बढ़ावा

NVS-03 की सफल लॉन्चिंग भारत के स्वदेशी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए अहम कदम है। NavIC प्रणाली देश और आसपास के क्षेत्रों में नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए विकसित की गई है। नई पीढ़ी के उपग्रह इस प्रणाली की निरंतरता और क्षमता बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं।

अब सैटेलाइट की आगे की प्रक्रिया और तकनीकी जांच महत्वपूर्ण होगी। इसके बाद ही इसकी सेवाओं को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आएगी। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और उपग्रह आधारित नेविगेशन सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *