तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘घमासान’ बुंदेलखंड के बीहड़ों, अपराध और राजनीति की पृष्ठभूमि पर बनी क्राइम थ्रिलर है। फिल्म में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। कहानी में पुलिस और एक खतरनाक डकैत के बीच टकराव दिखाया गया है। फिल्म का माहौल रॉ और जमीन से जुड़ा हुआ है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार के कारण यह अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती।
फिल्म को 5 में से 2.5 स्टार दिए जा सकते हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी बुंदेलखंड के एक ऐसे इलाके में सेट है, जहां अपराध और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यहां महाराज नाम का एक खूंखार डकैत अपने प्रभाव और खौफ के दम पर पूरे इलाके में अपना दबदबा बनाए हुए है। उसके नेटवर्क में हिंसा, वसूली और स्थानीय राजनीति की अहम भूमिका है।
इसी बीच आईपीएस अधिकारी आदित्य सिंह की इस इलाके में तैनाती होती है। चुनाव के दौरान उसकी जिम्मेदारी ऐसे क्षेत्र में होती है, जहां अपराधियों के डर के कारण आम लोगों के लिए स्वतंत्र रूप से मतदान करना भी चुनौती है। आदित्य कानून व्यवस्था कायम करने और महाराज के आतंक को खत्म करने की कोशिश करता है।
इसके बाद पुलिस अधिकारी और डकैत के बीच संघर्ष शुरू होता है। एक तरफ आदित्य की रणनीति है तो दूसरी ओर महाराज का मजबूत स्थानीय नेटवर्क। कहानी इसी टकराव के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है।
निर्देशन कैसा है?
तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म को चमकदार और स्टाइलिश बनाने के बजाय काफी रॉ ट्रीटमेंट दिया है। बुंदेलखंड की लोकेशन, गांव, जंगल और छोटे कस्बों का माहौल कहानी को वास्तविकता के करीब लाता है। फिल्म देखते हुए कई जगह ऐसा महसूस होता है कि दर्शक सीधे उसी इलाके का हिस्सा बन गया है।
हालांकि निर्देशन की सबसे बड़ी कमी इसकी गति में दिखाई देती है। शुरुआती हिस्से में कहानी को स्थापित करने में काफी समय लिया गया है। कई दृश्यों को जरूरत से ज्यादा लंबा खींचा गया है, जिससे रोमांच का असर कम हो जाता है। फिल्म में राजनीति और अपराध के रिश्ते को और गहराई से दिखाने की गुंजाइश थी, लेकिन कहानी बार-बार मुख्य टकराव पर लौट आती है।
अरशद वारसी और प्रतीक गांधी की एक्टिंग
अभिनय फिल्म का मजबूत पक्ष है। अरशद वारसी ने अपने किरदार में खतरनाक तेवर और जरूरी सख्ती दिखाई है। उनका अंदाज फिल्म के ग्रामीण और अपराधी माहौल के साथ अच्छी तरह मेल खाता है। वहीं प्रतीक गांधी ने पुलिस अधिकारी के किरदार में गंभीरता और संयम बनाए रखा है।
दोनों कलाकारों के बीच टकराव वाले दृश्य फिल्म को मजबूती देते हैं। खासकर जब दोनों किरदार आमने-सामने होते हैं, तब कहानी में तनाव बढ़ता है। सपोर्टिंग कलाकारों ने भी अपने हिस्से की भूमिकाओं को ठीक तरह से निभाया है, हालांकि कई किरदारों को स्क्रीनप्ले में पर्याप्त विस्तार नहीं मिला।
स्क्रीनप्ले और संवाद कमजोर कड़ी
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका स्क्रीनप्ले है। कहानी का आधार मजबूत है, लेकिन घटनाओं को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें कई जगह कसावट की कमी महसूस होती है। दर्शक कई घटनाओं का अनुमान पहले ही लगा सकता है।
संवादों में देसीपन जरूर है और कुछ लाइनें प्रभाव छोड़ती हैं, लेकिन वे कहानी को लगातार गति देने में सफल नहीं होतीं। कई जगह ऐसा लगता है कि बेहतर एडिटिंग और ज्यादा मजबूत स्क्रीनप्ले फिल्म को काफी प्रभावी बना सकता था।
कैसी है फिल्म?
‘घमासान’ उन दर्शकों को पसंद आ सकती है जिन्हें जमीन से जुड़ी क्राइम कहानियां, बीहड़ का माहौल और गंभीर पुलिस-डकैत संघर्ष पसंद है। फिल्म की लोकेशन और कलाकारों का अभिनय इसके मजबूत पक्ष हैं। वहीं धीमी रफ्तार, सीमित किरदार और कमजोर स्क्रीनप्ले इसका मजा कम कर देते हैं।
कुल मिलाकर, ‘घमासान’ में एक बेहतरीन क्राइम थ्रिलर बनने की क्षमता थी, लेकिन यह उम्मीद के स्तर तक नहीं पहुंच पाती। अरशद वारसी और प्रतीक गांधी की दमदार परफॉर्मेंस फिल्म को संभालती है, मगर कहानी की कमियां इसे एक औसत अनुभव बना देती हैं।
रेटिंग: 2.5/5

