भारत के कई एयरपोर्ट ऐसे हैं जहां सेना और नागरिक विमान एक ही इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे एयरपोर्ट को डुअल-यूज एयरपोर्ट कहा जाता है। इस मॉडल में भारतीय वायुसेना और सिविल एविएशन दोनों एक ही रनवे और एयर ट्रैफिक सिस्टम को साझा करते हैं। इसी श्रेणी का एक प्रमुख उदाहरण पुणे एयरपोर्ट है, जो इन दिनों एक बड़ी घटना के बाद चर्चा में आ गया है।
17 अप्रैल 2026 की रात पुणे एयरपोर्ट पर एक भारतीय वायुसेना का लड़ाकू विमान सुखोई अभ्यास उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी का शिकार हो गया। लैंडिंग के समय विमान के अंडरकैरिज में आई खराबी के कारण यह रनवे के बीचों-बीच हार्ड लैंडिंग कर फंस गया। राहत की बात यह रही कि पायलट पूरी तरह सुरक्षित रहे, लेकिन इस घटना ने पूरे एयरपोर्ट संचालन को घंटों के लिए रोक दिया।
चूंकि पुणे एयरपोर्ट एक डुअल-यूज सुविधा है, इसलिए यहां रनवे पर प्राथमिकता सैन्य विमानों को दी जाती है। ऐसे में जब फाइटर जेट रनवे पर फंस गया, तो किसी भी नागरिक विमान की न तो लैंडिंग हो सकी और न ही टेकऑफ। इस वजह से लगभग 30 से अधिक उड़ानें प्रभावित हुईं। कई फ्लाइट्स को रद्द करना पड़ा, जबकि कुछ को मुंबई और अहमदाबाद जैसे नजदीकी शहरों की ओर डायवर्ट किया गया।
हजारों यात्री रातभर एयरपोर्ट पर फंसे रहे और स्थिति सामान्य होने का इंतजार करते रहे। भारी मशीनों और क्रेनों की मदद से सुबह करीब 8 बजे तक रनवे को खाली कराया जा सका, जिसके बाद एयर ट्रैफिक दोबारा बहाल हुआ।
डुअल-यूज एयरपोर्ट मॉडल की खासियत यह है कि इसमें एक ही रनवे और एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल सैन्य और नागरिक दोनों उड़ानों के लिए किया जाता है। पुणे एयरपोर्ट मूल रूप से भारतीय वायुसेना का एक महत्वपूर्ण एयरबेस है, जिसे बाद में नागरिक उड़ानों के लिए भी आंशिक रूप से खोला गया। यहां रनवे और सुरक्षा व्यवस्था वायुसेना के नियंत्रण में रहती है, जबकि यात्री टर्मिनल का संचालन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया करती है।
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार को अलग से नया एयरपोर्ट बनाने में भारी खर्च नहीं करना पड़ता और मौजूदा सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर उपयोग हो जाता है। वहीं, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अगर किसी सैन्य विमान में तकनीकी खराबी आ जाए, तो पूरा नागरिक संचालन ठप हो सकता है, जैसा इस घटना में देखने को मिला।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते यात्री दबाव को देखते हुए पुणे जैसे शहरों को एक स्वतंत्र नागरिक एयरपोर्ट की जरूरत है। इसी वजह से लंबे समय से पुरंदर एयरपोर्ट की भी चर्चा चल रही है, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं से बचा जा सके।
फिलहाल इस घटना ने एक बार फिर डुअल-यूज एयरपोर्ट की सीमाओं और चुनौतियों को उजागर कर दिया है। यात्रियों को भले ही कुछ घंटों की परेशानी झेलनी पड़ी हो, लेकिन यह घटना एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट और आपातकालीन तैयारी को और मजबूत करने की जरूरत की ओर इशारा करती है।

