पश्चिम बंगाल में चल रही चुनाव प्रक्रिया के बीच एक नया विवाद सामने आया है, जिसने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) के नेता अमित मालवीय ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि कुछ पोलिंग बूथों पर बीजेपी के चुनाव चिन्ह कमल के सामने वाले बटन को टेप से ढक दिया गया था, जिससे मतदाताओं को वोट डालने में परेशानी हुई।
अमित मालवीय ने इस मुद्दे को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर उठाते हुए कुछ वीडियो भी साझा किए हैं। इन वीडियो में कथित तौर पर देखा जा सकता है कि ईवीएम मशीन में एक बटन के ऊपर टेप चिपका हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह जानबूझकर किया गया कदम है, ताकि मतदाता बीजेपी के पक्ष में वोट न डाल सकें।
मालवीय के अनुसार, यह मामला फलता विधानसभा क्षेत्र के कई बूथों पर सामने आया है। उन्होंने विशेष रूप से बूथ संख्या 144 (पार्ट 170), हरिणडांगा हाई स्कूल के रूम नंबर 2 और बूथ संख्या 189 का जिक्र किया है। उनका कहना है कि इन बूथों पर मतदान प्रक्रिया प्रभावित हुई है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
फलता विधानसभा सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प माना जा रहा है। यहां से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में बीजेपी द्वारा लगाए गए आरोपों ने चुनावी माहौल को और भी संवेदनशील बना दिया है।
हालांकि, इन आरोपों पर अभी तक भारत निर्वाचन आयोग या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चुनाव आयोग आमतौर पर ऐसे मामलों में जांच के बाद ही कोई बयान जारी करता है, इसलिए सभी की नजर अब आयोग की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप आम बात हैं, लेकिन ईवीएम से जुड़ा कोई भी विवाद बेहद गंभीर होता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता से जुड़ा होता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह चुनाव व्यवस्था पर सवाल खड़े कर सकता है, वहीं अगर यह गलत साबित होते हैं तो इसे राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है।
स्थानीय प्रशासन और चुनाव अधिकारियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है कि वे मतदान प्रक्रिया को निष्पक्ष और सुचारू बनाए रखें। मतदाताओं का भरोसा बनाए रखना चुनावी प्रक्रिया की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है।
फिलहाल, इस पूरे मामले में सच्चाई क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर चुनावी पारदर्शिता और तकनीकी सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ दी है।

