अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में एक बार फिर अस्थिरता देखने को मिल रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक बातचीत के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से दी गई सख्त चेतावनी के बाद वैश्विक तेल बाजार में तेज हलचल मच गई है। इस बयान का असर कच्चे तेल की कीमतों पर तुरंत देखने को मिला और ब्रेंट क्रूड की कीमत 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। वहीं, अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड भी 78 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण निवेशकों में चिंता बढ़ी है। इसी वजह से ऊर्जा बाजार में अचानक तेजी का माहौल बन गया है। तेल की कीमतों में आई इस बढ़ोतरी ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर हैं।
जानकारी के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन की ओर से यह संकेत दिया गया है कि यदि क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है या रणनीतिक समुद्री मार्गों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो अमेरिका कड़ा रुख अपना सकता है। इस बयान के बाद बाजार में आशंका पैदा हो गई कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि यदि वार्ता सफल नहीं होती या क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से होकर गुजरती है। यदि किसी कारणवश इस मार्ग पर आवाजाही बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में और अधिक तेजी देखी जा सकती है।
पिछले कुछ सप्ताहों में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी। बाजार को उम्मीद थी कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से तनाव कम होगा और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहेगी। इसी कारण कच्चा तेल 73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था। लेकिन हालिया भू-राजनीतिक घटनाओं ने बाजार की धारणा को बदल दिया है और कीमतों में फिर से तेजी लौट आई है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय हो सकती है। भारत अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा हो सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है।
फिलहाल वैश्विक बाजार की नजर मध्य पूर्व के घटनाक्रम और कूटनीतिक वार्ताओं पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय स्थिति और बातचीत के परिणाम तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है या बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहता है।

