नई दिल्ली की सियासत में एक बार फिर दल-बदल कानून को लेकर बहस तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसदों के संभावित पाला बदलने के बाद यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। खासकर राघव चड्ढा के नेतृत्व में सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की चर्चा ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल मचा दी है।
इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन सांसदों पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता लागू होगी या नहीं। संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे एंटी-डिफेक्शन लॉ कहा जाता है, इस तरह के मामलों में दिशा-निर्देश देती है। लेकिन इसमें कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिनकी वजह से यह मामला जटिल बन जाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद एक साथ पार्टी छोड़कर किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं, तो इसे दलबदल नहीं बल्कि ‘विलय’ माना जाता है। ऐसे में उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती। AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, और यदि 7 सांसद एक साथ पार्टी बदलते हैं, तो यह संख्या दो-तिहाई के आंकड़े को पूरा करती है। यही वजह है कि इस मामले को कानूनी रूप से मजबूत माना जा रहा है।
वरिष्ठ वकीलों जैसे मुकुल रोहतगी, नीरज किशन कौल और मनींदर सिंह का मानना है कि यदि विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य विलय का दावा करते हैं, तो यह अयोग्यता से बचने का वैध आधार हो सकता है। उन्होंने कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि ऐसी स्थिति में सांसदों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
हालांकि, इस मुद्दे पर सभी की राय एक जैसी नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अलग दृष्टिकोण रखा है। उनका कहना है कि केवल विधायी दल का विलय पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मूल राजनीतिक दल का विलय भी जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि विधायी दल और राजनीतिक दल अलग-अलग इकाइयां हैं।
सिंघवी ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में अंतिम फैसला सदन के सभापति या स्पीकर के हाथ में होता है, जो अक्सर सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं। इस वजह से निष्पक्ष निर्णय पर भी सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा कि मौजूदा दल-बदल कानून अब अप्रभावी हो चुका है और इसमें व्यापक सुधार की जरूरत है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि भारत में दल-बदल कानून की व्याख्या और उसका लागू होना कितना जटिल है। राजनीतिक दलों के बीच बदलते समीकरण और कानूनी प्रावधानों की अलग-अलग व्याख्याएं इस मुद्दे को और पेचीदा बना रही हैं।
फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह मामला किस दिशा में जाता है और क्या वास्तव में इन सांसदों पर अयोग्यता लागू होती है या नहीं। यह विवाद न केवल राजनीतिक बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।

