वाराणसी: अडाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अडाणी ने कहा है कि प्राचीन ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका इस्तेमाल आज की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने के लिए किया जाए। सोमवार को वाराणसी में आयोजित विश्व संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पुराने ज्ञान को केवल उसकी प्राचीनता के आधार पर मूल्यवान नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह देखना जरूरी है कि वह वर्तमान समय में कितना उपयोगी है।
‘आधुनिक चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में डॉ. प्रीति अडाणी ने सभ्यतागत ज्ञान को संरक्षित करने और उसे समाज के कल्याण के लिए इस्तेमाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञान में दुनिया को बदलने की शक्ति होती है, जबकि विवेक यह सुनिश्चित करता है कि बदलाव सही दिशा में हो।
दुख, असमानता और संघर्षों के समाधान में मददगार है प्राचीन ज्ञान
डॉ. प्रीति अडाणी ने कहा कि मानव सभ्यता ने सदियों के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है। इन अनुभवों और विचारों को केवल इतिहास तक सीमित रखने के बजाय वर्तमान सामाजिक चुनौतियों से जोड़ने की जरूरत है। उनके अनुसार, प्राचीन ज्ञान का इस्तेमाल दुख, असमानता और संघर्ष जैसी समस्याओं को कम करने के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि समाज की प्रगति का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं होना चाहिए। विकास ऐसा होना चाहिए, जिससे लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आए और समाज के सभी वर्गों को आगे बढ़ने के अवसर मिलें।
अरस्तू, भगवान बुद्ध और कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का किया उल्लेख
अपने संबोधन में डॉ. अडाणी ने विभिन्न सभ्यताओं के प्रमुख विचारकों और उनकी शिक्षाओं का जिक्र किया। उन्होंने यूनानी दार्शनिक अरस्तू के मानव विकास से जुड़े विचारों, भगवान बुद्ध की दुखों के निवारण की शिक्षाओं और प्राचीन चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के नैतिक आचरण तथा सामाजिक सद्भाव पर आधारित विचारों का उल्लेख किया।
उन्होंने इन विचारधाराओं को भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ से जोड़ते हुए कहा कि पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना आज भी प्रासंगिक है। उनके अनुसार, विभिन्न सभ्यताओं से प्राप्त ज्ञान और अनुभवों का उपयोग बेहतर समाज के निर्माण और सतत विकास को आगे बढ़ाने में किया जा सकता है।
सेवा और सामुदायिक विकास को बताया प्रगति का आधार
डॉ. प्रीति अडाणी ने सामुदायिक विकास के क्षेत्र में अपने संगठन के करीब तीन दशकों के कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी भी विकास कार्यक्रम की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे आम लोगों के जीवन में कितना सुधार आया है।
उन्होंने सेवा की भावना को समुदायों की जरूरतों को समझने, उनकी बात सुनने और उन्हें अपने भविष्य के फैसले लेने में सक्षम बनाने से जोड़ा। उनके अनुसार, विकास की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे समुदाय अपनी समस्याओं का समाधान खोजने और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
22 राज्यों के 7,000 गांवों तक पहुंच
1996 में स्थापित अडाणी फाउंडेशन समूह की सामाजिक विकास शाखा के रूप में काम करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह संगठन देश के 22 राज्यों के लगभग 7,000 गांवों में सक्रिय है और इसके प्रयासों से करीब 1.3 करोड़ लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
डॉ. प्रीति अडाणी के संबोधन का मुख्य संदेश यही रहा कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक सोच को साथ लेकर चलना समय की जरूरत है। जब ऐतिहासिक अनुभवों को वर्तमान की चुनौतियों से जोड़ा जाता है, तब वे समाज को अधिक समान, संवेदनशील और टिकाऊ भविष्य की ओर ले जाने में मदद कर सकते हैं।

