प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति को अपनी जिंदगी और रहने की जगह के बारे में खुद फैसला लेने का अधिकार है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक 25 वर्षीय युवती से जुड़े बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले की सुनवाई के दौरान की।
मामले में युवती की मां ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपनी बेटी को कोर्ट के सामने पेश किए जाने की मांग की थी। उनका कहना था कि बेटी को उनके साथ रहना चाहिए। अदालत के निर्देश पर युवती को पेश किया गया, जहां उसने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह अपनी इच्छा से दिल्ली में रह रही है और उसे किसी ने अवैध रूप से बंधक नहीं बनाया है।
बेटी ने मां के साथ रहने से किया इनकार
अदालत में पेश हुई 25 वर्षीय युवती ने साफ तौर पर कहा कि वह अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती। उसने बताया कि वह अपनी मर्जी से दिल्ली में रह रही है और उसके रहने पर किसी तरह का दबाव नहीं है।
युवती ने अपनी मां पर गंभीर आरोप भी लगाए। उसका कहना था कि घर पर रहने के दौरान मां का व्यवहार उसके प्रति ठीक नहीं था। उसने आरोप लगाया कि मां अक्सर उसके साथ मारपीट करती थीं और गाली-गलौज भी करती थीं। इसी वजह से उसने अलग रहने का फैसला किया है।
मां ने आरोपों से किया इनकार
युवती की मां ने उसके आरोपों को खारिज किया। उनका कहना था कि बेटी को माता-पिता के साथ रहना चाहिए और उन्होंने अदालत से उसे उनके साथ भेजने की मांग की।
हालांकि, कोर्ट के सामने युवती ने अपनी इच्छा स्पष्ट कर दी। अदालत ने उसके बयान को गंभीरता से लेते हुए उसकी उम्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखा। चूंकि युवती बालिग है, इसलिए वह अपनी इच्छा के अनुसार रहने और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को माना महत्वपूर्ण
अदालत ने कहा कि किसी बालिग व्यक्ति की इच्छा को नजरअंदाज करके उसे किसी खास व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। केवल माता-पिता होने के आधार पर उन्हें अपनी वयस्क बेटी के रहने के फैसले पर जबरन नियंत्रण का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने यह भी माना कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का इस्तेमाल किसी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के खिलाफ माता-पिता के साथ रहने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने याचिका कर दी खारिज
मामले में पहले अदालत ने युवती को पेश करने का निर्देश दिया था। निर्देश के अनुपालन में युवती अदालत के सामने पहुंची और उसने अपनी इच्छा स्पष्ट कर दी। सुनवाई के दौरान अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि युवती किसी अवैध हिरासत में है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने मां की याचिका खारिज कर दी। फैसले में बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अपनी पसंद से रहने के अधिकार और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को महत्व दिया गया। यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि वयस्क व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान किया जाना जरूरी है।

