राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने लुधियाना की दो कंपनियों ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स को बड़ा झटका दिया है। अपीलीय न्यायाधिकरण ने दोनों कंपनियों की अपील खारिज करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की चंडीगढ़ पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें उन्हें दो कमर्शियल प्रॉपर्टी खाली करने का निर्देश दिया गया था।
दो हफ्ते में संपत्ति खाली करने का आदेश
मामला कराबारा और हुसैनपुरा स्थित दो व्यावसायिक संपत्तियों से जुड़ा है। NCLT ने दोनों कंपनियों को इन संपत्तियों को दो सप्ताह के भीतर खाली करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ कंपनियों ने अपीलीय न्यायाधिकरण का रुख किया था।
कंपनियों की ओर से दलील दी गई थी कि उनके पास 30 साल की लीज डीड के आधार पर इन संपत्तियों में किरायेदारी का अधिकार है। उनका कहना था कि यदि उन्हें संपत्ति से हटाया जाना है तो इसके लिए किराया नियंत्रण कानून के तहत संबंधित किराया नियंत्रक के समक्ष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
हालांकि, NCLAT ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और NCLT के आदेश को कायम रखा।
लीज डीड को लेकर भी उठे सवाल
अपीलीय न्यायाधिकरण ने मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित लीज डीड की वैधता पर भी गौर किया। न्यायाधिकरण ने पाया कि जिन लीज डीड के आधार पर कंपनियां संपत्ति पर अपना अधिकार बता रही थीं, वे रजिस्टर्ड नहीं थीं।
इसी आधार पर न्यायाधिकरण ने कहा कि इन दस्तावेजों को संबंधित दावे के समर्थन में साक्ष्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस वजह से कंपनियों की ओर से पेश किया गया किरायेदारी का दावा कमजोर पड़ गया।
मामले में दोनों कंपनियों के निदेशकों और कॉरपोरेट देनदार के निलंबित निदेशकों के बीच पारिवारिक संबंध का मुद्दा भी सामने आया। न्यायाधिकरण ने इस तथ्य को भी अपने आदेश में दर्ज किया।
परिसमापक की जिम्मेदारी पर अहम टिप्पणी
NCLAT ने अपने फैसले में दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत परिसमापक की भूमिका को भी स्पष्ट किया। न्यायाधिकरण ने कहा कि IBC की धारा 35 के तहत कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा लेना परिसमापक का वैधानिक दायित्व है।
परिसमापक का मुख्य उद्देश्य दिवाला प्रक्रिया के दौरान कंपनी की संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेना और उनका कानून के अनुसार निपटारा करना होता है। ऐसे में यदि किसी संपत्ति पर किसी अन्य पक्ष का कब्जा है, तो परिसमापक उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।
किराया कानून से अलग IBC का प्रभाव
न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान IBC के प्रावधानों को प्राथमिकता मिलती है। IBC की धारा 238 के तहत इस कानून का प्रभाव अन्य कानूनों पर अधिभावी माना जाता है, यदि दोनों के प्रावधानों में टकराव हो।
इसका मतलब यह है कि कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया के तहत परिसमापक को कंपनी की संपत्तियों पर कब्जा लेने के लिए हर स्थिति में अलग किराया नियंत्रण प्रक्रिया शुरू करने की आवश्यकता नहीं है। संबंधित परिस्थितियों में NCLT के समक्ष कार्रवाई के जरिए भी संपत्ति खाली कराई जा सकती है।
इस फैसले के बाद ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स के लिए दोनों कमर्शियल प्रॉपर्टी खाली करने का रास्ता साफ हो गया है। साथ ही, यह फैसला दिवाला प्रक्रिया के दौरान कॉरपोरेट संपत्तियों पर परिसमापक के अधिकार और जिम्मेदारियों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

